होलिका व प्रह्लाद तो बहाना हैं। मकसद है हर साल नियम से तन, मन, रिश्तों व धरती में जमा कंकास को जलाकर खाक करना, उल्लास मनाना। अभी तो कंकास इतना है कि हर तिमाही होली की जरूरत है।और भीऔर भी

चीजों को कायदे से देखने-समझने के लिए उनसे ऊपर उठना जरूरी है। मगर धरती पर रहते हुए उससे ऊपर कैसे उठें? संसार में रहते हुए उससे निर्लिप्त कैसे हों? वैसे ही जैसे दही को मथो और मक्खन ऊपर।और भीऔर भी

वही खाना, वही सोना, वही जागना, वही नहाना, वही धोना। यह क्रम है जिसे हर दिन निभाना रहता है। घर की सफाई हर दिन करनी पड़ती है। इसी तरह ज्ञान के लिए एक दिन नहीं, हर दिन पढ़ना पड़ता है।और भीऔर भी

यहां हर चीज का अपना स्वतंत्र चक्र है। तन का भी और उससे जुड़े मन का भी। खुद को दूसरे के हवाले करते ही चक्र उसकी शर्तों पर ढल जाता है। पर मुक्ति अपने चक्र के अपनी शर्तों पर चलने से मिलती है।और भीऔर भी

दुनिया जंगल है और उसकी सारी राहें पत्तों से ढंकी हैं। बड़े होते ही मां-बाप का हाथ छोड़ राह की तलाश में जुट जाते हैं। सच्चा गुरु मिला तो मिल जाती है मंजिल। नहीं तो ताज़िंदगी भटकते रह जाते है।और भीऔर भी

ज़िंदगी में कभी कमजोर, कायर व भीरु लोगों से नाता नहीं बनाना चाहिए। उन पर रहम करो, लेकिन दूर से। पास बैठा लिया तो सिर पर चढ़कर ऐसी चिल्ल-पों मचाएंगे कि आपका चलना ही दूभर हो जाएगा।और भीऔर भी

हम जैसे ही कोई काम शुरू करते है, खटाक से अंदर से आवाज़ आती है – बाद में कर लेंगे। यह जड़त्व है जो चीजों का जैसे का तैसा रहने देना चाहता है। हर कदम पर इसे तोड़कर ही आगे बढ़ना पड़ता है।और भीऔर भी

यह देश गांधी, सुभाष व पटेल का था, तब था। अभी हमारा है। जब हैं, तभी तक है क्योंकि देश तो वह पौध है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लहलहाती रहती है। जो अगली पीढ़ी की नहीं सोचता, वह देशभक्त नहीं, भोगी है।और भीऔर भी

सही ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के बिना हम इस दुनिया में आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह विचरते हैं। अंदाज सही लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। चोट सिर में लगती है और मरहम घुटनों में लगाते हैं।और भीऔर भी

अतीत से चिपके रहे तो वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते। अतीत को ठुकरा दिया, तब भी वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते क्योंकि अतीत ही हमें अपने कर्मों के सही-गलत होने का भान कराता है।और भीऔर भी