जिंदगी के हाईवे पर मुसीबतें इसलिए नहीं आतीं कि आप लस्त होकर चलना ही बंद कर लें, बल्कि मुसीबतों का हर दौर आपको वह मौका उपलब्ध कराता है जब आप ठहरकर अब तक के सफर की समीक्षा और आगे की यात्रा की तैयारी कर सकते हैं।और भीऔर भी

समाज का मुलम्मा भले ही लगा हो, लेकिन हमारी सारी भावनाओं का स्रोत मूलतः प्रकृति ही होती है। शरीर के रसायन और खुद को संभालने व गुणित करते जाने का प्राकृतिक नियम हमें नचाता रहता है। हमारा अहं भी प्रकृति की ही देन है।और भीऔर भी

जटिलता से क्या भागना! सरलता की मंजिल तो जटिलता से गुजरकर ही मिलती है। आंतरिक संरचनाएं जितनी जटिल होती जाती हैं, चीजें उतनी आसान हो जाती हैं। खुद-ब-खुद आसानी से खुलनेवाला कांच का दरवाजा अंदर से जटिल होता है।और भीऔर भी

सृजन व संगीत की मधुर स्वर लहरियां शांत मन से ही निकलती हैं। झंझावात से बवंडर ही उठते हैं। चीख-चिल्लाहट के माहौल में सृजन नहीं हो सकता। इसे यह कहकर जायज नहीं ठहराया जा सकता कि विनाश सृजन की जमीन तैयार करता है।और भीऔर भी

मन कहता है भगत सिंह हों। बुद्धि कहती है कि मेरे घर नहीं, दूसरे के घर। बोल वचन में हम किसी से कम नहीं। लेकिन कर्म की अपेक्षा दूसरों से करते हैं। दूसरे नहीं करते तो दोष उनका। यूं ही कड़ी से कड़ी चलती जाती है और होता कुछ नहीं।और भीऔर भी

बुद्ध अपने जमाने तक ज्ञात हालात में सधे हुए चिंतक थे, सुधारक थे, मसीहा थे। लेकिन तब के बुद्ध अब आम हो चुके हैं। आज किसी को खास बुद्ध बनना है तो उसे उसी तरह ज्ञात व उपलब्ध हालात को साधना पड़ेगा, जैसे तब के बुद्ध से साधा था।और भीऔर भी

गुरुत्वाकर्षण और विद्युत चुम्बकीय शक्तियों से ही पूरी सृष्टि चलती है। बाकी सारी शक्तियां इन्हीं का कोई न कोई रूप हैं। इनके अलावा कोई अदृश्य शक्ति नहीं। ये शक्तियां नियमबद्ध होकर चलती हैं। कभी व्यक्ति-व्यक्ति का भेद नहीं करतीं।और भीऔर भी

कालरूपी परमात्मा ने ही इन सभी लोकों को धारण किया हुआ है। वह कालरूपी परमात्मा ही इन सभी लोकों में चारों ओर व्याप्त है। वही इन सब प्राणियों का पिता भी है और इन सबका पुत्र भी। संसार में उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं। ।।अथर्ववेद।।और भीऔर भी

आज़ादी के पहले और इतने सालों बाद भी जिन हिंदुस्तानियों ने अंग्रेज़ी को अपनाया, विकास और उन्नति का हर रास्ता उनके लिए खुल गया। बाकी लोग निर्वासित हैं। अपनी माटी को दुत्कारती यह कैसी व्यवस्था है जिसे हम ढोए चले जा रहे हैं?और भीऔर भी

मैं बड़ा कि तू? तू सही कि मैं? जब घनघोर समस्याएं हर तरफ से दबोचे हुए हों, तब ऐसी तकरार का क्या तुक! ऐसे में मुनासिब यही है कि सारे मतभेदों को भुलाकर समस्या से एक साथ जूझा जाए। अहं का मसला बाद में फिर कभी निपटा लेंगे।और भीऔर भी