जमाने की सीधी चढ़ाई भावनाओं के मुलायम पोरों से नहीं, बुद्धि के कठोर नखों के दम पर पाई जा सकती है। जोंक जैसा चिपकने का गुण या बाघनखी जैसी पकड़। नहीं तो बार-बार आप फिसलते ही रहेंगे।और भीऔर भी

जो लोग देखने से ही मना कर देते हैं, उनके फैसले कैसे सही हो सकते हैं? तथ्यों से सत्य और सत्य से सूत्र निकलते हैं। पहला चरण है तथ्यों की तहकीकात। जो इससे भागते हैं, उनके सूत्र सरासर बकवास हैं।और भीऔर भी

कौन है जो आंखों के होते हुए भी देख नहीं पाता? वो कौन है जो कानों के रहते हुए भी सुन नहीं पाता? वो कौन है जो जुबान रहते हुए भी बोल नहीं पाता? अंदर के कृष्ण से पूछो कि अर्जुन ऐसा अशक्त क्यों है?और भीऔर भी

ये शरीर, हम और हमारा अवचेतन। अभिन्न हैं, फिर भी स्वतंत्र हैं। हम सोते हैं तो अवचेतन सुश्रुत वैद्य की तरह हमारी मरहम पट्टी में लग जाता है। शरीर तो मर्यादा पुरुषोत्त्म है। बस, हम ही बावले हैं।और भीऔर भी

धन आपके पास तभी तक नहीं है, जब तक या तो आप दूसरों के काम के नहीं बन पाए हैं या दूसरों को आपकी उपयोगिता का पता नहीं है। पहले उपयोगिता, फिर उसकी मार्केटिंग। यही सूत्र है धन बनाने का।और भीऔर भी

भगत सिंह 23 साल ही जीकर अमर हो गए। 39 साल के जीवन में विवेकानंद दुनिया पर अमिट छाप छोड़ गए। ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपने लिए नहीं, उन अपनों के लिए जिए जो परिवार तक सीमित नहीं थे।और भीऔर भी

बाहरी हालात तो सबसे लिए वही होते हैं। जो अंदर से मजबूत होते हैं, वे उनसे टकराकर पहले से और ज्यादा तेजस्वी होकर उभरते हैं। लेकिन जिनके अंदर के हालात कमजोर होते हैं, वे दबकर मिट जाते हैं।और भीऔर भी

नए विचारों का आना कोई समस्या नहीं। समस्या है तो पुराने विचारों का न जाना, कुंडली मारकर बैठे रहना। उनकी जकड़बंदी टूटे तभी तो नए की जगह बनेगी। अन्यथा नए विचार यूं ही आकर जाते रहेंगे।और भीऔर भी

तर्क की हद तक वहीं खत्म हो जाती है, जहां तक चीजें रैखिक होती हैं। धरती को जब तक चिपटा माना जाता रहा, तब तक तर्क ही सर्वोपरि थे। लेकिन धरती के गोल होते ही तर्क का सारा पटरा हो गया।और भीऔर भी

सभ्य से सभ्य समाज में भी इंसान के अंदर एक जानवर बैठा रहता है। जो रिवाज इस जानवर को हवा देते हैं, उन्हें बेरहमी से खत्म कर देने की जरूरत है। परंपरा के नाम उन्हें चलाते रहना हैवानियत है।और भीऔर भी