सरकार के कर्मों से ही डूबा है जीडीपी!
अर्थव्यवस्था की विकास दर पत्थर पर लिखी इबारत नहीं होती, न लम्बी अवधि की और ना ही छोटी अवधि की। शेयर बाज़ार की तरह उसकी गति कतई रैण्डम भी नहीं होती। अगर ऐसा होता तो नीति बनानेवालों की कोई ज़रूरत ही नहीं होती। सब कुछ भगवान-भरोसे या आज के संदर्भ में कहें तो राम-भरोसे होता। अर्थव्यवस्था या जीडीपी की विकास दर हमेशा सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों से तय होती है। नीतियां सही नहीं रहीं तो सारीऔरऔर भी
उतरने लग गई ‘विकास गाथा’ की कलई
एक तरफ ‘मोदी-अडाणी एक हैं’ के नारे का जवाब भाजपा ‘राहुल-सोरोस एक हैं’ से दे रही है। दूसरी तरफ भारत की विकासगाथा की कलई उतरती जा रही है। सितंबर महीना बीतने के बाद 9 अक्टूबर को पेश मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही या सितंबर तिमाही में जीडीपी की विकास दर 7%, तीसरी तिमाही में 7.4%, चौथी तिमाही में 7.4% और पूरे वित्त वर्ष में 7.2% का अनुमान उछाला था। लेकिनऔरऔर भी
दिखाया भ्रष्टाचार तो गालियां गद्दार की!
क्या भारत की विकासगाथा इतनी भुरभुरी, कमज़ोर बुनियाद और कच्ची दीवार पर खड़ी है कि भ्रष्टाचार का सच उजागर करने से खतरे में पड़ जाएगी और जो भी इस मुद्दे को उठाने की कोशिश करेगा, उसे गद्दार व देशद्रोही करार दिया जाएगा? ऐसा होना तो नहीं चाहिए। लेकिन देश में इस वक्त यही हो रहा है। भरी संसद में भाजपा के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस सांसद और नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी को देशद्रोही करार दिया। वहीं, संसदऔरऔर भी
निवेश में हाहाकार नहीं, बरतें समझदारी
शेयर बाज़ार तो चक्रों में चलता है। लेकिन हमें निवेश की अपनी सोच व रणनीति को हमेशा संतुलित रखना होता है। भावना में बहकर लिए गए फैसले निवेश की सफलता के सबसे बड़े दुश्मन होते हैं। भीड़ की भेड़चाल में नहीं फंसना है। न कभी लालच में आकर निवेश करना है, न ही डरकर अफरातफरी में बेचकर निकल जाना है। निवेश से रिटर्न कमाने के तीन मुख्य रास्ते हैं। एक, उधार देकर उस पर ब्याज कमाना। देशऔरऔर भी






