बाजार की उम्मीद और अटकलें खोखली निकलीं। रिजर्व बैंक गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव ने ब्याज दरों में कोई तब्दीली नहीं की है। बल्कि, जिसकी उम्मीद नहीं थी और कहा जा रहा था कि सिस्टम में तरलता की कोई कमी नहीं है, मुक्त नकदी पर्याप्त है, वही काम उन्होंने कर दिया। सीआरआर (नकद आरक्षित अनुपात) को 4.75 फीसदी से घटाकर 4.50 फीसदी कर दिया है। यह फैसला इस हफ्ते शनिवार, 22 सितंबर 2012 से शुरू हो रहे पखवाड़े सेऔरऔर भी

जिस तरह ड्रग-एडिक्ट नशे के बिना पसीना-पसीना हो जाता है, उसी तरह हम भी धन और घर की चक्की के ऐसे आदी हो जाते हैं कि उसके बिना सब सूना लगने लगता है। फुरसत हमें काटने दौड़ती है और हम उसी चक्की की ओर दौड़े चले जाते हैं।और भीऔर भी

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं – ग़ालिब का ये शेर अभी तक अपुन पर पूरा फिट नहीं बैठा है। कारण, मुश्किलें तो पड़ती जा रही हैं, लेकिन आसां नहीं हो रहीं। इस चक्कर में फिर से आपकी सेवा में हाज़िर नहीं हो पा रहा। एक वजह यह भी है कि पेड सर्विस शुरू करने का मन नहीं बना पा रहा हूं। मेरा मानना है कि ज्ञान किसी की बपौती नहीं है और इसेऔरऔर भी

अभी तक रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव अपनी अघोषित जिद पर अड़े हुए थे कि जब तक केंद्र सरकार राजकोषीय मोर्चे पर कुछ नहीं करती या दूसरे शब्दों में अपने खजाने का बंदोबस्त दुरुस्त नहीं करती, तब तक वे मौद्रिक मोर्चे पर ढील नहीं देंगे। यही वजह है कि पिछले दो सालों में 13 बार ब्याज दरें बढ़ाने के बाद रिजर्व बैंक ने इस साल अप्रैल में इसमें एकबारगी आधा फीसदी कमी करके फिर हाथ बांधऔरऔर भी

इंद्रियां हैं, हार्मोंस हैं, तभी जीवन है। नहीं तो मर गए समझो। मेलमिलाप, सुख-दुख इन्हीं से तो है। कोई इंद्रजीत नहीं। संत नहीं, ढोंगी हैं। हां, दुनिया-समाज को समझने के लिए अपने से बाहर निकलना पड़ता है जिसके लिए इंद्रियों का शमन करना पड़ता है।और भीऔर भी

देखना कभी खत्म नहीं होता। देखने के अनंत संदर्भ हैं। कोई भी प्रेक्षण अंतिम नहीं। एक सापेक्ष परिप्रेक्ष्य में जो महान है, वही दूसरे परिप्रेक्ष्य में अधम हो सकता है। सफेद भिन्न परिप्रेक्ष्य में स्याह है, श्रेष्ठ निम्न है, सभ्य बर्बर और पूरब पश्चिम हो सकता है।और भीऔर भी

समाज बार-बार जमकर जड़ होती और टूटकर फिर से बनती सत्ता का नाम है। यथास्थिति बनी रही तो कुशल है। अन्यथा बवाल मच जाता है। नया कुछ करनेवालों को समाज का बहुमत नकारता है। लेकिन अल्पमत को लेकर वही लोग नया समाज बनाते हैं।और भीऔर भी

हम ज्यादातर अपनी निष्क्रियता और दूसरे के कर्मों का फल भोगते हैं। जिस दिन से हम सोच-समझकर कायदे से अपने कर्मों पर उतर आते हैं, उसी दिन से सफलता की हमारी यात्रा शुरू हो जाती है। ऊंच-नीच जरूर आती है, लेकिन मंजिल मिलकर रहती है।और भीऔर भी

इंसानों की बनाई इस दुनिया में कुछ भी पूर्ण नहीं। अपनी समझ से सब कुछ सही करते हुए भी हम गलत मोड़ पर पहुंच सकते हैं। तरीका सही, जवाब एकदम गलत। लेकिन इस तरह हम अपनी सोचने की प्रक्रिया को माजते हुए जरूर पूर्ण बना सकते हैं।और भीऔर भी

कल क्या हुआ, यह हम सभी जानते हैं। लेकिन कल क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। कल अच्छा भी हो सकता है, सामान्य भी और बुरा भी। एक अकेले व्यक्ति का इस पर कोई वश नहीं। हां, सामूहिक रूप से जरूर इसे कुछ हद तक बांधा जा सकता है।और भीऔर भी