दस-बारह साल पहले तक इंट्रा-डे ट्रेडरों का मंत्र था कि किसी भी शेयर को बिड प्राइस (जिस पर कोई खरीदना चाहता है) पर खरीदो और आस्क प्राइस (जिस पर कोई बेचना चाहता हो) पर बेच दो। अमूमन आस्क प्राइस बिड प्राइस से ज्यादा होता है तो ट्रेडर इस अंतर से कमा लेते थे। लेकिन जब से अल्गोरिदम आधारित हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेड होने लगे तो रिटेल ट्रेडर पिटने लगा और स्विंग ट्रेड उसका सहारा बना। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में आपको वही धन लगाना चाहिए जिसकी ज़रूरत आपको अगले 5-10 साल तक नहीं पड़ने जा रही। यह वो धन होना चाहिए जो आप अपने बाल-बच्चों के लिए छोड़ कर जाना चाहते हैं। अगर आप हर दिन भाव देखने और यह पता लगाने के लिए बेचैन रहते हैं कि आपका पोर्टफोलियो कितना बढ़ा तो आपको शेयर बाज़ार से दूर ही रहना चाहिए। शेयरों में निवेश नियमित कमाई का विकल्प नहीं है। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

एक कोशिका के अमीबा से लाखों करोड़ कोशिकाओं वाले इंसान तक। जीवन व उससे जुड़ी चीज़ें ऐसे ही जटिल से जटिलतर होती जाती हैं। अमूमन लोग ट्रेडिंग में इंट्रा-डे, स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड तक जानते हैं। हालांकि, इधर लोग डेरिवेटिव ट्रेड भी आजमाने लगे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि कुछ ट्रेडर निफ्टी के स्पॉट और फ्यूचर्स भाव के अंतर पर ही खेलते हैं। इन्हें प्रोग्राम ट्रेडर कहते हैं। अब पकड़ते हैं शुक्रवार का ट्रेड…औरऔर भी

कुछ लोग निफ्टी का टारगेट ही बताते फिरते हैं। हो गया तो ढिंढोरा, नहीं तो चुप्पी। कोई जवाबदेही तो है नहीं। दसअसल, यह केवल खुद और दूसरों को भ्रम में रखने जैसा फितूर है क्योंकि कोई अल्गोरिदम या अत्याधुनिक गणना बाज़ार की भावी चाल का सटीक आकलन नहीं कर सकती। फिर असल बात यह नहीं कि निफ्टी कहां जाएगा, बल्कि यह है कि बाज़ार कहीं भी जाए, उससे नोट कैसे बनाए जाएं। अब चलाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी