ऋण देना समझ में आता है। लेकिन ऋण भी बिकने लग जाए तो माथा घूम जाता है। बैंक जो ऋण वसूल नहीं पाते, उसे दूसरे के माथे मढ़ देते हैं। उसे लेनेवाला इसे बोझ नहीं, बल्कि धंधा समझता है। तमाम एसेट रीक्रंस्ट्रक्शन कंपनियां बन चुकी हैं। सीडीओ, सीडीएस जैसे न जाने कितने प्रपत्र बन चुके हैं। यह अलग बात है कि इन्हीं के चक्कर में 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बैंक वित्तीय बाज़ार की पहली कड़ी हैं। लोगों को बचत की सुविधा और थोड़ा ब्याज देना। फिर वो बचत उद्योग व ज़रूरतमंद लोगों को ज्यादा ब्याज पर देकर कमाना। लेकिन बैंक आज इस सरल धंधे से बहुत आगे निकल चुके हैं। निवेश बैंकिंग उनका बड़ा धंधा बन चुका है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैंकों के ट्रेजरी विभाग में काम करनेवालों की तनख्वाह औरों से तीन गुना तक ज्यादा होती है। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जब भी हम किसी माध्यम से कमाने की सोचते हैं तो उसका मूल हमें पता होना चाहिए। अन्यथा, हम छायाओं से ही खेलते रह जाएंगे। हम सभी वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं। आज वित्तीय बाज़ार में बिचौलियों की न जाने कितनी परतें घुस गई हैं। लेकिन मूलतः इसका मकसद था कि बचत करनेवाले को उसका उपयोग करनेवालों से ऐसे जोड़ा जाए कि दोनों का फायदा हो। अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

वॉरेन बफेट कायदे से समझने से पहले कंपनी को हाथ नहीं लगाते। भरपूर रिसर्च के बाद उन्होंने 2011 में आईबीएम का शेयर खरीदा। तब वो 170 डॉलर पर था। अभी 138 डॉलर पर है। जिन चार सालों में एस एंड पी 500 सूचकांक 1285 से 62.5% बढ़कर 2088 पर पहुंच गया, उसी दौरान आईबीएम से बफेट को 18.8% का घाटा! फिर भी बफेट को अफसोस नहीं क्योंकि उन्होंने सुरक्षित मार्जिन पर खरीदा था। अब आज की कंपनी।औरऔर भी

उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है। स्टार्ट-अप वाले भी जुगाड़ टाइप रिस्क ही लेते हैं। आईआईएम या आईएमएम वाले सुरक्षित रिस्क लेते हैं। समझने की बात है कि ट्रेडर न तो उद्यमी है, न ही स्टार्ट-अप या फाइनेंस का मास्टर। उसका ट्रेड ऐसा है जिसमें बाज़ी बड़े बारीक अंतर से इधर से उधर चली जाती है। इसलिए उसे हिसाब लगाना पड़ता है कि इतना हारे, उतना जीते तो फायदे के लिए सौदे में रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कितना होनाऔरऔर भी