वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग चुटकी बजाकर अमीर बनाने का धंधा नहीं है। यहां सरकारी बांडों या बैंकों की एफडी जैसी सुरक्षा नहीं है। यहां तो दीर्घकालिक निवेश जैसी निश्चिंतता भी नहीं है। यह एक तरह का बिजनेस है। टैक्स के लिहाज से भी इसे बिजनेस ही माना गया है और इससे हुई आय पर उसी हिसाब से टैक्स लगता है। शेयरों की ट्रेडिंग में उतरनेवालों को यह बुनियादी बात हमेशा याद रखनी चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

4 दिसंबर 2014 से 4 दिसंबर 2015 के बीच बीएसई-500 सूचकांक 5.5% गिरा है। लेकिन इन 500 कंपनियों में से 130 ऐसी हैं जिन्होंने 15% से ज्यादा रिटर्न दिया है। सबसे ज्यादा 296.7% रिटर्न राजेश एक्सपोर्ट्स ने दिया है। साफ है कि गिरते बाज़ार में भी चयन सही हो तो कमाने के भरपूर मौके हैं। लेकिन हर चमकनेवाली चीज़ सोना नहीं होती क्योंकि राजेश एक्सपोर्ट्स से भी मजबूत कंपनी उसी के उद्योग में है। आज यही कंपनी…औरऔर भी

अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक में नोट छापकर बाज़ार में डालने का सिलसिला चला हुआ है। ब्याज दर लगभग शून्य है। ऐसे उधार पर 2-4% सालाना रिटर्न भी मिल जाए तो निवेशकों की मौज। इसी बेहद सस्ते धन के दम पर दुनिया भर के बाज़ार चढ़े हुए हैं। सालोंसाल से अमेरिकी कंपनियों का धंधा और मुनाफा ठहरा हुआ है। फिर भी डाउ जोन्स सूचकांक ऐतिहासिक चोटी तक चला गया। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का मकसद बड़ा सीधा-सरल है। वो लोगों की उस पूंजी को खींचने का माध्यम है जिसे उद्योग-धंधों में लगाने का रिस्क लिया जा सकता है। लेकिन आज लोगों को इसमें कोई उद्योग नहीं, बल्कि नोट कमाने का धंधा भर दिखता है। यह लालच व डर की भावना का भुनाने का ज़रिया बन गया है। शेयरों के भाव कंपनी की ताकत पर नहीं, बल्कि सस्ते धन के आगम पर चढ़े हुए हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी