डेरिवेटिव सौदे शेयरों की असली चाल की ही छाया हैं। इसलिए उनमें सट्टेबाज़ी का तत्व भी ज्यादा है। हमारी सरकार को यह तत्व घटाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि बढ़ाने की। वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं है। जैसे, आम नियम यह है कि सटोरिया सौदे से हुए नुकसान को सटोरिया सौदे से ही हुए मुनाफे से बराबर किया जा सकता है। लेकिन शेयर बाज़ार के डेरिवेटिव्स सौदे इस नियम से एकदम मुक्त हैं। अब शुक्र का अभ्सास…औरऔर भी

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जून 2013 में एक विशेषज्ञ दल बनाया था जिसने अपनी रिपोर्ट सितंबर के पहले हफ्ते में ही सरकार को सौंपी है। इसमें उसने कहा कि वित्तीय सेवाओं में ट्रेडिंग के लिए भारत आकर्षक ठिकाना नहीं है। इसलिए यहां शेयरों के डेरिवेटिव सौदों पर लग रहा 0.01% एसटीटी भी खत्म कर देना चाहिए ताकि विदेशी निवेशकों को ज्यादा खींचा जा सके। आप सोचें कि ऐसा करना कहां तक सही होगा। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की खरीद-बिक्री पर सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स या एसटीटी लगाने का सिलसिला तब के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने 2004 के बजट से शुरू किया था। तब से इनकी दरें बदलती रही हैं। अभी कैश बाज़ार में खरीदने और बेचने दोनों पर 0.1% का एसटीटी लगता है, जबकि डेरिवेटिव्स में केवल बेचने पर इसका 1/10 यानी, 0.01% टैक्स लगता है। इस वजह से सब एफ एंड ओ की तरफ खिंचते चले गए। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

अचंभे की बात यह है कि डेरिवेटिव्स या फ्यूचर्स व ऑप्शंस सौदों में देशी और विदेशी निवेशक संस्थाओं का योगदान 10% से भी कम है। हर दिन वहां होने वाले औसतन दो-ढाई लाख करोड़ रुपए के वोल्यूम का लगभग 90% हिस्सा रिटेल या अमीर निवेशकों और प्रॉपराइटरी ट्रेडरों व ब्रोकर फर्मों का है। सट्टेबाज़ी की मानसिकता इसकी एक वजह है। दूसरी अहम वजह यह है कि इन सौदों पर कम टैक्स लगता है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में कैश सेगमेंट का वोल्यूम पिछले दस सालों में 15% सालाना की चक्रवृद्धि दर से बढ़ा है, जबकि डेरिवेटिव सेगमेंट 67% की दर से। हमारा डेरिवेटिव बाज़ार कैश बाज़ार का 16 गुना हो चुका है। यह दक्षिण कोरिया के बाद दुनिया का सबसे बड़ा डेरिवेटिव बाजार है। निफ्टी इंडेक्स ऑप्शंस का बाज़ार तो दुनिया में सबसे बड़ा है, एस एंड पी 500 इंडेक्स के ऑप्शंस से भी बड़ा। आखिर क्यों? फिलहाल सोमवार का व्योम…औरऔर भी