कम मूर्ख कमाते हैं ज्यादा मूर्ख से
बाज़ार में लालच व डर की दो प्रमुख भावनाओं का व्यापार चलता है। भावनाओं में बहने के मामले में हम सभी मूर्ख हैं। हममें से कुछ लोग ज्यादा मूर्ख होते हैं, कुछ लोग कम। इनमें बुद्धिमान इंसान वो जो जानता है कि वो मूर्ख है। दरअसल, यहीं से वो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाने की क्षमता विकसित करता है और दूसरों की भावनाओं का फायदा उठाकर बाज़ार से कमाने लगता है। अब निकालते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
सिद्धांत व्यवहार में बदले अभ्यास से
तैरने का सिद्धांत जानकर अगर तैरना आ जाता तो हर कोई तैराक बन जाता। सिद्धांत अपनी जगह है और व्यवहार अपनी जगह। हर सिद्धांत व्यवहार से निकलता है और बाद में व्यवहार की सेवा कर पुख्ता बनता है। ट्रेडिंग के सारे सिद्धांत और दांवपेंच आपको किताबों में मिल जाएंगे। इंटरनेट ऐसी जानकारियों से पटा पड़ा है। लेकिन कठिन व लंबे अभ्यास के बाद ही हम उसे अपने काम का बना पाते हैं। अब पकड़ें मंगल की दृष्टि…औरऔर भी
डूबते यहां अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक तक
दुनिया के सबसे बुरे निवेशकों में बड़े-बड़े विद्वान, अर्थशास्त्री व वैज्ञानिक तक शामिल है। आइजैक न्यूटन का धन जब ब्रिटेन की साउथ सी कंपनी में साल 1720 में डूब गया तो उनका कहना था – मैं नक्षत्रों की गति की गणना कर सकता हूं, लेकिन इंसानों के पागलपन की नहीं। शेयर बाज़ार में अपना और दूसरों का धन डुबाने वालों में नोबेल विजेता माइरॉन शोल्स व रॉबर्ट मेर्टन भी शामिल हैं। अब परखते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी
नाम ही अपने-आप में पर्याप्त नहीं
शेयर खरीदना साबुन-तेल या जीन्स खरीदने जैसा नहीं है कि जाना-पहचाना व आजमाया ब्रांड डिस्काउंट देख कर खरीद लिया। यकीनन यहां भी नाम की अपनी भूमिका है। लेकिन केवल नाम ही खुद में पर्याप्त नहीं है। हमें देखना पड़ता है कि कंपनी अपने शेयरधारकों के लिए मूल्य पैदा कर रही है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि खाली हवाबाज़ी करके प्रवर्तकों की जेब भरने का इंतज़ाम किया जा रहा है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी






