स्टेडियम में जाकर फुटबॉल या क्रिकेट मैच देखना उन्हीं लोगों को शोभा देता है जिनके पास इफरात धन है या जिन्हें अपने शौक की दीवानगी है। इसी तरह ट्रेडरों का भी एक तबका है जो बाज़ार में रोमांच के लिए आता है। दस-बीस हज़ार रुपए इधर-उधर हो जाएं तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जो वित्तीय आज़ादी या नियमित आय के लिए ट्रेडिंग करते हैं, उन्हें रोमांच कतई शोभा नहीं देता। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दुनिया-जहान में कुछ भी स्थाई या शाश्वत नहीं। बदलाव ही शाश्वत सच है। हमें दिखे या न दिखे, भौगोलिक परिवेश के साथ ही हमारे निजी व सामाजिक जीवन में बराबर परिवर्तन होते रहते हैं। बदलाव के साथ चलने वाली कंपनियों का ही धंधा निरंतर बढ़ता है। इधर दुनिया डिजिटल होती जा रही है। ‘डिजिटल इंडिया’ पर आगे कुछ सालों में 4.5 लाख करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं। आज तथास्तु में डिजिटल लहर पर सवार कंपनी…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार बने ही ऐसे हैं कि अधिकांश लोग नोट गंवाते हैं और जीतनेवालों का छोटा-सा ग्रुप नोट पर नोट बनाता है। ट्रेडिंग के वही साधन, वही अपटिक्स व डाउनटिक्स। मगर ज्यादातर ट्रेडर रोते और मुठ्टी भर ट्रेडर हंसते हैं। कंसर्ट में भी गायक व आयोजक कमाते हैं। लेकिन वहां भीड़ को नोट देकर भावनाओं में बहने का आनंद मिलता है। यहां तो भावनाएं आनंद नहीं, दुख का सबब बनती हैं। अब नए साल का पहला अभ्यास…औरऔर भी

सफल ट्रेडर खुद पर भरोसा करते हैं, लेकिन घमंडी कतई नहीं होते। वित्तीय बाजार में वही लोग टिक पाते हैं जो हमेशा सतर्क रहते हैं और लचीलापन बरतते हैं। हमें अपने हुनर और अपनाई गई ट्रेडिंग पद्धति पर ज़रूर भरोसा होना चाहिए। लेकिन जो कुछ नया हो रहा है, उसे जानने-सीखने व स्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। ज़रूरत के हिसाब से ढलना ट्रेडर को आना ही चाहिए। अब साल की चलाचली का आखिरी दिन…औरऔर भी

वित्तीय आज़ादी को लेकर लोग गंभीर हैं। वे खुद टेक्निकल एनालिसिस जैसे हुनर सीख रहे हैं। नेट से ढूंढकर किताबें पढ़ रहे हैं। साथ ही उनकी ख्वाहिश को भुनाने के लिए वित्तीय बाज़ारों पर ऑनलाइन व ऑफलाइन क्लासेज़ भी होने लगे हैं। आज का तबका वैसा नहीं है जो 1990 के आसपास हर्षद मेहता की हवा में उड़कर बाज़ार में आ गया था। आज का ट्रेडर भावनाओं में बहने का नुकसान समझता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी