ट्रेडिंग का मकसद साफ होना चाहिए
वित्तीय बाज़ार में सबका मसकद अलग-अलग होता है। एनालिस्ट का मकसद भौकाल बनाना है ताकि वो अपना और अपनी फर्म का फायदा करा सके। हमारा फायदा उसका मकसद नहीं है। ब्रोकर का मकसद हमसे ज्यादा से ज्यादा ट्रेड कराना होता है ताकि उसे जमकर ब्रोकरेज मिल सके। हमें भी साफ होना चाहिए कि हम ट्रेडिंग क्यों कर रहे हैं क्योंकि हम इतने रईस नहीं हैं कि इतना महंगा शौक पाल सकें। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी
ट्रेडिंग में रोमांच नहीं सुहाता सबको
स्टेडियम में जाकर फुटबॉल या क्रिकेट मैच देखना उन्हीं लोगों को शोभा देता है जिनके पास इफरात धन है या जिन्हें अपने शौक की दीवानगी है। इसी तरह ट्रेडरों का भी एक तबका है जो बाज़ार में रोमांच के लिए आता है। दस-बीस हज़ार रुपए इधर-उधर हो जाएं तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जो वित्तीय आज़ादी या नियमित आय के लिए ट्रेडिंग करते हैं, उन्हें रोमांच कतई शोभा नहीं देता। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी
डिजिटल दौर में ठौर है कंपनी का
दुनिया-जहान में कुछ भी स्थाई या शाश्वत नहीं। बदलाव ही शाश्वत सच है। हमें दिखे या न दिखे, भौगोलिक परिवेश के साथ ही हमारे निजी व सामाजिक जीवन में बराबर परिवर्तन होते रहते हैं। बदलाव के साथ चलने वाली कंपनियों का ही धंधा निरंतर बढ़ता है। इधर दुनिया डिजिटल होती जा रही है। ‘डिजिटल इंडिया’ पर आगे कुछ सालों में 4.5 लाख करोड़ रुपए खर्च होने जा रहे हैं। आज तथास्तु में डिजिटल लहर पर सवार कंपनी…औरऔर भी
अधिकांश रोते, मुठ्ठीभर हंसते क्यों!
वित्तीय बाज़ार बने ही ऐसे हैं कि अधिकांश लोग नोट गंवाते हैं और जीतनेवालों का छोटा-सा ग्रुप नोट पर नोट बनाता है। ट्रेडिंग के वही साधन, वही अपटिक्स व डाउनटिक्स। मगर ज्यादातर ट्रेडर रोते और मुठ्टी भर ट्रेडर हंसते हैं। कंसर्ट में भी गायक व आयोजक कमाते हैं। लेकिन वहां भीड़ को नोट देकर भावनाओं में बहने का आनंद मिलता है। यहां तो भावनाएं आनंद नहीं, दुख का सबब बनती हैं। अब नए साल का पहला अभ्यास…औरऔर भी






