हमारे समाज में बहुतेरे लोग आदतन खुद को तोप-तमांचा साबित करने में लगे रहते हैं। जानते नहीं कि मैं कौन हूं? ऐसे जुमले आपने भी बराबर सुने होंगे। यही लहज़ा शेयर बाज़ार से जुड़े लोगों में भी नज़र आता है। डंके की चोट पर बताते हैं कि फलांना शेयर कहां तक जानेवाला है। दरअसल, इस हवाबाज़ी के पीछे खुद को महत्वपूर्ण बताने की मानसिकता काम कर रही होती है। इन्हें किनारे रखकर देखें अब सोम का व्योम…औरऔर भी

मंगलम ड्रग्स में हमने निवेश की पहली सलाह पांच साल पहले जब 22 नवंबर 2010 को दी थी, तब उसका शेयर 20 रुपए पर था। 1 जनवरी 2015 तक वो वहीं अड़ा रहा। लेकिन वहां से उठा तो 8 दिसंबर तक 20 से सीधे 441 तक पहुंच गया। फिर गिरा तो महीने भर में 261 तक पहुंच गया। फिर भी 2015 में 1205% का सर्वाधिक रिटर्न इसी शेयर ने दिया है। अब आज का तथास्तु…और भीऔर भी

हम हाई-फ्रीक्वेंसी या अल्गोरिदम ट्रेडिंग से आक्रांत रहते हैं। भूल जाते हैं कि उन्नत से उन्नत सॉफ्टवेयर भी इंसान को मात नहीं दे सकता। हम आक्रांत रहते हैं कि संस्थाएं और एचएनआई करोड़ों में खेलते हैं, जबकि हम उनके सामने पिद्दी भी नहीं हैं। लेकिन हर कमज़ोरी में कोई न कोई ताकत छिपी होती है। जिस तरह हाथी को मुड़ने में वक्त लगता है, वैसे ही संस्थाएं छोटे सौदों से नहीं कमा पातीं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

पूंजी, दरअसल हमारी बड़ी सीमा है। हम ऑप्शंस खरीदते हैं क्योंकि उसमें कम पूंजी लगती है। लेकिन हकीकत यह है कि ऑप्शंस खरीदना अक्सर घाटे का सौदा होता है। रिसर्च से पता चला है कि ऑप्शंस के दाम अमूमन औकात से ज्यादा चढ़े होते हैं। इसलिए फायदा उन्हें बेचने या राइट करने में है, न कि खरीदने में। लेकिन ऑप्शंस बेचने के लिए कम से कम 5 लाख रुपए की पूंजी होनी चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

कोई शेयर चंद दिनों में 20-25% बढ़ जाए या हमने जिसे बेचा वो उसके बाद भी जमकर चढ़ जाए तो हमारा दिल मसोस कर रह जाता है। वास्तविकता यह है कि बाज़ार हर कारोबारी दिन खुलता है और ट्रेडिंग के सैकड़ों अच्छे अवसर फेंकता है। लेकिन बाज़ार के सारे अवसर हमारे नहीं हो सकते क्योंकि हमारी पूंजी और दायरा सीमित है। अपनी सीमा को समझकर आगे देखें, पीछे देखना निरर्थक है। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी