बाज़ार में जब भावनाएं उबाल पर हों, वो कब कौन-सी दिशा में कहां तक चला जाएगा, इसका भरोसा न हो तब माना जाता है कि ट्रेडरों के लिए शिकार का बहुत अच्छा दौर है। लेकिन कौन-से ट्रेडरों के लिए? वैसे ट्रेडरों के लिए जिनमें जमकर रिस्क लेने का अनुभव और दमखम होता है। सामान्य या कमज़ोर रिस्क प्रोफाइल वाले ट्रेडरों के तो तंबू-कनात इस दौरान उखड़ जाया करते हैं। इसलिए संभलकर। अब चलाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

देश 67वें गणतंत्र दिवस तक आ पहुंचा। लेकिन क्या हम गणतंत्र में गण यानी अपनी भूमिका समझते हैं? एक बात जान लें कि गणतंत्र में गण ही संप्रभु होता है। सारी सत्ता जनता में ही निहित है। लेकिन गूंगे को बोलने और पंखहीन को उड़ने की आज़ादी का क्या मतलब है! इसी तरह अवाम के ज्ञानवान बने बिना कोई भी गणतंत्र या अर्थतंत्र मजबूत नहीं होता। इसलिए ज्ञानवान बनना हमारा परम कर्तव्य है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

देश में उपभोक्तावाद बढ़ने का शोर है। मगर, सच यह है कि दो-चार प्रतिशत को छोड़ दें तो बाकी भारतीय बड़े किफायती हैं। थोड़े में काम चला लेते हैं। हमारी खपत का स्तर दुनिया के तमाम देशों की तुलना में बहुत कम है। लेकिन थोड़ा देखा-देखी और सांस्कृतिक बदलावों के चलते हमारी खपत का स्तर उठने लगा है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था और कंपनियों के लिए संभावनाएं निखरती जा रही है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

टेलिविज़न महंगा हो जाए या दाल महंगी हो जाए तो इससे उपभोक्ता को फर्क पड़ता है, व्यापारी को नहीं। उसे तो अपने मार्जिन से मतलब है जिसकी एक निश्चित रेंज होती है। माल महंगा मिला तो महंगा बेचेगा, सस्ता मिला तो सस्ता। माल के दाम उसके वश में नहीं। इसी तरह वित्तीय बाज़ार का ट्रेडर मूलतः व्यापारी है। भावों की मगज़मारी छोड़ उसकी नीति होनी चाहिए – थोक में खरीदो, रिटेल में बेचो। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी