सत्यमेव जयते भारत का राष्ट्रीय वाक्य है। इसे करीब ढाई हज़ार साल पुराने मुण्डक उपनिषद से लिया गया है। लेकिन यह आज की बाज़ार प्रणाली का भी आदर्श वाक्य है। स्वस्थ बाज़ार के लिए आवश्यक है कि यहां सच और केवल सच पेश किया जाए। इसके लिए पारदर्शिता बेहद ज़रूरी है। लिस्टेड कंपनियों से हरेक सूचना बाजार में साझा करने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन सरकार ही पारदर्शिता न बरते तो! अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही होती हैं तो सरकार का टैक्स अपने-आप बढ़ता जाता है। लेकिन ऐसा नहीं होने पर सरकार पके-पकाए संसाधनों पर हाथ साफ करने लग जाती है। ऑप्शंस सौदों पर एसटीटी 0.017% से 0.050% करना और ईपीएफ में जमाधन के 60% हिस्से को टैक्स के दायरे में लाना ऐसी ही हरकत है। सरकार भूल गई कि टैक्स कमाई गई आय पर लगता है, न कि ईपीएफ जैसी बचाई गई आय पर। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट में अवैध जमा स्कीमों का फ्रॉड रोकने के लिए केंद्रीय कानून बनाने का वादा किया गया है। लेकिन इन्हीं स्कीमों जैसा ‘चमत्कार’ सरकार ने भी दिखाने की कोशिश की है। उसका कहना है कि वो 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी। इन छह सालों की सालाना चक्रवृद्धि दर 12.25% और मासिक दर 1% ही निकलती है। हर महीने 5% कमाने पर छह साल में मूलधन 33.55 गुना हो जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

भारत को विकासशील से विकसित देश बनने में कम से कम दस साल लगेंगे। इसी हिसाब से देश में टैक्स संग्रह भी बढ़ना चाहिए। इस बार टैक्स संग्रह का लक्ष्य जीडीपी का 10.82% रखा गया है। विकासशील देशों में यह अमूमन 10-20% रहता है, जबकि विकसित देशों में इसकी रेंज 30-40% रहती है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि भारत को इसे दो-तीन साल में 15% और पांच-सात साल में 20% तक पहुंचा देना चाहिए। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

आज बजट का दिन है। तय कार्यक्रम के मुताबिक वित्त मंत्री अरुण जेटली 11 बजे से लोकसभा में भाषण शुरू कर देंगे। बाज़ार की धारणा चूंकि विदेशी पूंजी व विशेषज्ञों की राय से बनने लगी है। इसलिए सबसे अहम होगा कि राजकोषीय घाटे और जीडीपी का वास्तविक अनुपात इस बार कितना रहा और नए वित्त वर्ष के लिए उसका अनुमान क्या है। लेकिन हमारे लिए कहीं ज्यादा अहम है कि टैक्स-जीडीपी का अनुपात। अब सोम का व्योम…औरऔर भी