हम में से हर किसी का व्यक्तित्व थोड़ा-बहुत अलग होता है। हमारी पसंद-नापसंद भी भिन्न होती है। दुकान में हज़ारों शर्ट होती हैं, लेकिन हमें कुछ ही पसंद आती हैं। इसी तरह बाज़ार के खिलाड़ियों का रुझान अलग-अलग शेयरों की तरफ होता है। उनके जुड़ने के चलते हर शेयर का अपना अलग स्वभाव बन जाता है। कोई धीमी गति से चलता है तो कोई बहुत तेज़ उछलता है। सबके ट्रिगर अलग होते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

जैसे-जैसे हम शेयरों की चाल के पीछे के इंसानों को देखने की दृष्टि हासिल करते जाते हैं, वैसे-वैसे सारा खेल हमारे सामने खुलता जाता है। तब तक हम अंधेरे में ही तीर मारते रहते हैं। दरअसल, शेयर बाज़ार की सारी शिक्षा-दीक्षा का मतलब ही यह है कि उसमें सक्रिय लोगों की श्रेणियों की पहचान कर ली जाए। रिटेल निवेशक भेड़चाल चलते हैं जबकि प्रोफेशनल ट्रेडरों व संस्थाओं की मुठ्ठी में रहता है बाज़ार। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

समाज में जो कुछ घटता है, उनके पीछे कोई न कोई इंसान या इंसानों का समूह हुआ करता है। चूंकि हमारे देखने-सोचने की सीमा है, इसलिए झंझट में न पड़कर हम घटनाओं को अक्सर अदृश्य शक्तियों का प्रताप मान लेते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में भी यही होता है। जब तक अदृश्य ताकतों का प्रभाव मानकर किस्मत से खेलते हैं, तब तक हारते हैं। वहीं, असलियत समझने के बाद जीतने लगते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अगर अपने यहां बाज़ार व समाज में आज भी ठगी का बोलबोला है तो इसका मतलब यही है कि बाज़ार का समुचित विकास नहीं हुआ। इसमें ‘चलता है’ का हमारा अंदाज़ बड़ा बाधक है। खाने-पीने का सामान या दवा खरीदते वक्त हम एक्पायरी तिथि तक नहीं देखते। लेकिन विकसित देश बनने की प्रक्रिया में यह जागरूकता बढ़ रही है और उसी के साथ बढ़ रही हैं कुछ कंपनियां। तथास्तु में आज इसी ज़रूरत से उपजी एक कंपनी…औरऔर भी