काया वही, बस छायाएं बदलती हैं
कंपनियों का धंधा उतनी तेज़ी से नहीं बदलता जितनी तेज़ी से शेयर बाज़ार ऊपर या नीचे होता है। कंपनी का धंधा मजबूत होने के बावजूद उसका शेयर गिर सकता है क्योंकि बाज़ार का मूल्यांकन या पी/ई अनुपात तमाम वजहों से नीचे आ जाता है। यही मूल्यांकन हमें किसी अच्छी कंपनी में घुसने और निकलने का मौका देता है। पी/ई ज्यादा तो बेचकर निकल लिए और पी/ई कम तो निवेश कर लिया। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी
सस्ते अमेरिकी धन ने फुलाया गुब्बारा
अमेरिका में पचास लाख करोड़ डॉलर ईमानदार मेहनत और बचत से आए होते तो आज दुनिया के हालात कुछ और ही होते। तब, फेडरल रिजर्व को ब्याज दर को असहज तरीके से शून्य या उसके पास रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पिछले दस सालों में उसकी इस नीति के कारण अमेरिका के बचतकर्ताओं को करीब आठ लाख करोड़ डॉलर गंवाने पड़े हैं। ऊपर से सस्ता अमेरिकी धन वैश्विक बाजारों को फुलाए पड़ा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी
दौलत नहीं, बनता वहां ऋण का पहाड़
सामान्य हालात में स्वस्थ अर्थव्यवस्था के बीच लोग काम करते, बचाते और पाई-पाई जोड़कर दौलत बनाते हैं। लेकिन आज की अर्थव्यवस्था अलग है खासकर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था, अमेरिका। वो उधार पर बढ़ी जा रही है, न कि बचत की बदौलत। वहां दौलत नहीं, ऋण का बोझ बनाया जा रहा है। 1980 से लेकर अब तक अमेरिका में असल दम के ऊपर 50 लाख करोड़ डॉलर का ऋण चढ़ाया जा चुका है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी







