देश आज़ादी के सत्तरवें साल में प्रवेश कर गया। अब तक के उनहत्तर सालों के अनुभव ने साफ कर दिया है कि हमने बाजार को जितना समझा और बाज़ार शक्तियों को जितना मुक्त किया है, बड़ों से लेकर छोटों तक के विकास के अवसर उतने ही ज्यादा खुले हैं। वहीं, सरकार ने जहां-जहां अपना अंकुश कसा है, वहां-वहां बंटाधार हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा में सरकार की पक्की भूमिका है। बाकी नहीं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

अच्छी कंपनी उतनी ही मेहनत में ज्यादा मूल्य पैदा कर लेती है। विकसित देश वो है जो एकसमान मेहनत व संसाधनों में ज्यादा मूल्य सृजित करता है। साथ ही समान मेहनत के वो ज्यादा दाम देता है। अपने यहां कामगार को ज्यादा वेतन देता है और समाज में ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराता है। विकास का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक वो मूल्य नहीं पैदा करता। तथास्तु में विकास व मूल्य-सृजन में लगी एक कंपनी…औरऔर भी

केंद्र सरकार ने नई व्यवस्था यह की है कि अब ब्याज दरों का फैसला रिजर्व बैंक के गवर्नर नहीं, बल्कि छह सदस्यों की समिति करेगी जिसमें तीन सदस्य रिजर्व बैंक और तीन सरकार द्वारा मनोनीत अधिकारी होंगे। साथ ही सरकार ने अगले पांच साल के लिए मुद्रास्फीति को 4% तक बांधे रखने का लक्ष्य किया है। जाहिर है कि मुद्रास्फीति कम रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाने की कसरत की जाती रहेगी। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बाज़ार में किसी दूसरी चीज़ की तरह पूंजी के दाम का फैसला भी मांग और आपूर्ति के संतुलन से होना चाहिए। मांग ज्यादा, आपूर्ति कम तो ब्याज दर बढ़े। मांग कम तो ब्याज घटे। लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस मामले में खुल्लमखुल्ला धांधागर्दी चला रहे हैं। अमेरिका ने नोट छापकर सिस्टम में डालने का काम 2008 में शुरू किया। 2009 में यूरोप और 2010 में जापान ने ऐसा किया। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी