संस्कृत की सदियों पुरानी कहावत है महाजनो येन गतः स पन्थाः। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भी यह सूक्ति चलती है कि ‘ट्रेन्ड इज़ योर फ्रेन्ड’ और हमेशा ट्रेन्ड के साथ ट्रेड करो। लेकिन कभी ध्यान से सोचने की कोशिश कीजिए कि यह ट्रेन्ड आखिर बनता कैसे है? कौन उसकी चाल का आगाज़ करता है? फिर कभी-कभी तो कोई ट्रेन्ड ही नहीं होता और शेयर बाज़ार सीमित रेंज में कदमताल करते रहते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

चक्रवात हो या सुनामी, उसके आगे छोटे-बड़े या अमीर-गरीब, सभी का रिस्क एक जैसा होता है। इसी तरह बाज़ार का रिस्क संस्थाओं से लेकर रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों तक समान रहता है। फर्क बस इतना है कि दोनों इस रिस्क को अलग तरीके से देखते और उससे निपटते हैं। रिटेल ट्रेडर हमेशा टिप्स पकड़ने के लिए हर किसी से पूछता है कि बाज़ार कहां जाएगा, जबकि संस्थाएं बाज़ार का मूड जानने के लिए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

हिंदी समाज के ज्यादातर बुद्धिजीवी शेयर बाज़ार को हिकारत की नज़र से देखते हैं। उन्हें नहीं दिखता कि यह समृद्धि में हिस्सा बांटने का बेहद लोकतांत्रिक तरीका है। आम आदमी कंपनी तो नहीं बना सकता। लेकिन वो शेयर बाज़ार के माध्यम से अच्छी से अच्छी कंपनी के मालिकाना में अंश खरीद सकता है। वैसे भी इधर भारत-पाक तनाव ने अच्छी कंपनियों के शेयर थोडा सस्ते कर दिए हैं। तथास्तु में पेश है ऐसी ही एक अच्छी कंपनी…औरऔर भी

हर नए ट्रेडर को भावनाओं को साधने के दौर से गुजरना ही पड़ता है क्योंकि इसके बिना ट्रेडिंग में कामयाबी मिल ही नहीं सकती। लेकिन भावनाओं पर नियंत्रण पाने में सालोंसाल लग जाते हैं। फिर भी मन की परम अवस्था हमेशा के लिए स्थाई नहीं रहती। वहां बराबर ‘काम प्रगति पर है’ जैसी स्थिति बनी रहती है। याद रखें कि ट्रेडर पैदाइशी नहीं होते, बल्कि वे यहीं पर सीखकर बनते हैं। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

दिमाग को जैसा पढ़ा दो, वो तोता-रटंत कर लेता है। लेकिन मन को सिखाने में बड़ी मशक्कत व वक्त लगता है। बचपन व परिवेश से मिली वृत्तियां सहजबोध या कॉमन-सेंस बनकर वहां जमी रहती हैं जो हमारे विचारों से लेकर भावनाओं तक को नियंत्रित करती हैं। फिर उन्हीं के हिसाब से शरीर की तमाम ग्रंथियां हार्मोन्स का स्राव करती हैं और हम कभी उनके विषम दुष्चक्र से निकल ही नहीं पाते। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी