दुनिया हर दिन छोटी होती जा रही है। कभी चीन, कभी जापान तो कभी यूरोप व अमेरिका की आर्थिक राजनीतिक हलचल भारत जैसे बाज़ारों को प्रभावित करती रहती है। ग्लोबीकरण ने कम से कम सभी देशों के वित्तीय बाज़ारों को एक तार में बांध दिया है। किसी एक देश की अनिश्चितता से अन्य देशों की अनिश्चितता नत्थी हो गई है। इसे हम रोक तो नहीं सकते। लेकिन इसके रिस्क को बांध सकते हैं। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

नोटबंदी ने देश के 25 करोड़ से ज्यादा परिवारों ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था तक की रीढ़ हिला दी है। अपने यहां काम-धंधे का अनौपचारिक क्षेत्र है जो फैक्टरी, खनन, कंपनी या दुकानों से जुड़े कानूनों में पंजीकृत नहीं है। इसका देश के कुल उत्पादन में 48% और रोज़गार में 80% हिस्सा है। इसे तगड़ा झटका लगा है। संगठित क्षेत्र की छोटी कंपनियां भी परेशान हैं। हालांकि उनका आधार बड़ा मजबूत है। तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

बाज़ार में कोई सामान खरीदने जाते हैं तो उसे सस्ते में खरीदने की कोशिश करते हैं। दुकानदार से यह नहीं कहते कि 24,000 का यह टीवी मुझे पसंद है और मैं इसे 30,000 रुपए में खरीदने को तैयार हूं। लेकिन शेयर बाज़ार में हम ऐसा ही बेवकूफाना बर्ताव करते हैं। शेयर का भाव बढ़ जाने पर हमें तसल्ली होती है, तब हम उसे खरीदते हैं। यह ट्रेडिंग में विफलता का दूसरा कारण है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में नाकामी की पहली वजह यह है कि किताबों, वेबसाइटों व क्लासेज़ में हमें पांरपरिक टेक्निकल एनालिसिस सिखाई जाती है। बताया जाता है कि जब हर कोई खरीद रहा हो, तब खरीदो। जब सभी बेच रहे हों, तब बेचो। हमें भीड़ की भेड़चाल में धकेल दिया जाता है। जब भाव चढ़ चुका होता है, खबर जज्ब हो चुकी होती है, तब हम सौदा करते हैं तो फायदा कैसे होगा? अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी