जीवन में रिस्क है। धंधे में भी रिस्क है। लेकिन सभ्यता के विकास के साथ इंसान ने रिस्क को संभालने का भी इंतज़ाम किया। छोटी कंपनियों ने निर्यात किया तो बड़ी कंपनियां नए भूगोल में ही पहुंच गईं। इधर अमेरिका व ब्रिटेन में अपने बाज़ार को बचाने का नारा लग रहा है। लेकिन तमाम बड़ी कंपनियों ने अपना बिजनेस दायरा सारी दुनिया में फैलाकर जोखिम कम कर लिया है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक बड़ी कंपनी…औरऔर भी

गणतंत्र दिवस बीत गया। राजधानी दिल्ली में समूचे भारत की सांस्कृतिक झांकियों से लेकर सामरिक शक्ति का प्रदर्शन भी हुआ। लेकिन हम एक बात भूल जाते हैं कि गणतंत्र में जितनी अहम भूमिका आमजन की है, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका बाज़ार की है। सरकार या चंद व्यक्ति बाज़ार को अपनी उंगलियों पर नचाने लग जाएं तो आम नहीं, खासजन की मौज हो जाती है और गणतंत्र उसी पल दम तोड़ने लगता है। अब करें शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

गणतंत्र अपनी मूल भावना के साथ काम करे और निर्वाचित प्रतिनिधि बेलगाम न हो जाएं, इसके लिए संविधान बनाया जाता है। हर मसले पर जबरस्त बहस के बाद संविधान बनाया जाता है। फिर भी कुछ मसले छूट या नए मुद्दे सामने आ जाएं तो संविधान में संशोधन का अधिकार संसद के पास होता है। साथ ही न्यायपालिका संविधान की रक्षा का काम करती है। यह सैद्धांतिक व्यवस्था है। लेकिन व्यवहार क्या है? अब आजमाएं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार गणतंत्र की ऊपरी अवधारणा है। मूल है सत्ता की लगाम आमजन के हाथों में होना जो निश्चित अंतराल, जैसे भारत में पांच साल पर वोट से पहले चुने गए प्रतिनिधियों को हटा सकता है। लेकिन दो चुनावों के बीच के पांच सालों में आमजन असहाय रहता है और तब उसके वोटों से जीते प्रतिनिधि ही उसके माई-बाप बन जाते हैं। उन्हें ‘वापस बुलाने का अधिकार’ मिलना ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी