कौन नहीं जानता कि सामान्य व्यापार से लेकर वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाने का मुख्य आधार है थोक भाव पर खरीदना और रिटेल भाव पर बेचना। ट्रेडिंग के तर्क, नियम और रणनीति को सीखना-समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। लेकिन असली चुनौती तब शुरू होती है जब हम उन्हें व्यवहार में अपनाना शुरू करते हैं। तब सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा हो जाता है हमारा मन, उसमें उठ रहे भाव व भावनाएं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

पच्चीस साल पहले शेयर बाज़ार में ऐसी ही गहमागहमी थी। हर तरफ हर्षद मेहता का जलवा था। कहते थे कि जिसे वो हाथ लगाए, सोना बन जाए। लेकिन जब वो हीरो से ज़ीरो बना तो लाखों निवेशकों व ट्रेडरों की बचत स्वाहा हो गई। सबक यह कि चढ़े हुए बाज़ार के पीछे भागना ठीक नहीं। निवेश तभी करें, जब भाव वाजिब स्तर पर आ जाए। तथास्तु में एक अच्छी कंपनी जिसमें निवेश के लिए इंतज़ार करना होगा…औरऔर भी

वित्तीय साक्षरता का मूलाधार है धन का समय-मूल्य। जब तक समाज में महंगाई का वजूद है, जिससे मुद्रास्फीति और ब्याज़ दरों का सीधा रिश्ता है, तब तक हमें गांठ बांध लेनी होगी कि साल भर बाद का सौ रुपए आज के सौ रुपए से कमतर होगा। पांच साल में अगर हमारी आय 10,000 से 20,000 हो गई और मुद्रास्फीति सालाना 10% रही है तो हमारी आय हकीकत में मात्र 4105 रुपए बढ़ी है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

अगर हम वित्तीय रूप से साक्षर नहीं हुए तो वित्तीय सलाहकार या ब्रोकर ही नहीं, सरकार तक हमें उल्लू बनाती रहेगी। आखिर वो भी तो हमारे प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स से चलती है। अभी तो अवाम या देश का भला हो या न हो, मगर नेताजी का भरपूर भला हो जाता है। वे पांच साल में इतना बना लेते हैं कि सात पुश्तें किसी राजा-रजवाड़े की तरह बैठकर खा सकती हैं। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय साक्षरता या शिक्षा का मकसद है कि हमें कोई उल्लू न बना सके, चाहे वो सरकार हो या वित्तीय सलाहकार। दिक्कत यह है कि शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करनेवाले लोग तक खुद को वित्तीय मामलों में कायदे से शिक्षित नहीं करते। नतीजा यह होता है कि ब्रोकर उनके साथ बड़े आराम से छल करता है। बीमा एजेंट पॉलिसी बेचकर अपने कमीशन का इंतज़ाम कर लेता है, मगर उन्हें सब्जबाज़ दिखाकर। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी