एक बात में मोदी सरकार को कोई भी मात नहीं दे सकता, न भूतो न भविष्यति। वो है धन की उगाही। उसने 146 करोड़ देशवासियों में से किसी को नहीं छोड़ा। जीएसटी लगाकर नवजात बच्चे से लेकर मरनेवाले तक से टैक्स वसूलने की व्यवस्था कर ली। वो अपनी धन उगाही में कोई खलल नहीं चाहती। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल जब भी सस्ता हुआ, उसने एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाकर अपना खजाना भर लिया और आम ग्राहकों तक इसकाऔरऔर भी

निवेश हमारे आर्थिक व वित्तीय जीवन में छाई अनिश्चितता से लड़ने का साधन है। जिस तरह युद्ध जीतने के लिए सेना बनाकर चला जाता है, जिसमें थल, वायु व नौसेना की अलग-अलग भूमिका होती है, उसी तरह निवेश में सफलता के लिए पोर्टफोलियो बनाकर चलना पड़ता है। कुछ धन सोने में, कुछ एफडी व पीपीएफ जैसे स्थाई आय के माध्यमों में, कुछ हिस्सा ज़मीन-जायदाद में और कुछ हिस्सा शेयर बाज़ार में। शेयर बाज़ार में भी कुछ कंपनियांऔरऔर भी

विकास और विकसित भारत 146 करोड़ भारतवासियों में से हर किसी को चाहिए। यह हम सबकी आकांक्षाओं और सपनों का केंद्र है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम इंडिया में शामिल भाजपा शासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री जिस विकास और विकसित भारत का एजेंडा चला रहे हैं, उसके केंद्र में हैं मात्र कुछ हज़ार कंपनियां जिनका सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपए से ज्यादा है। उनके विकसित भारत के केंद्र में न किसान है, न मजदूर, नऔरऔर भी

देश में एक बार फिर विकसित भारत और ट्रिलियन-ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का राग बजना शुरू हो गया है। फर्क बस इतना है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गेंद राज्यों के पाले में डालकर निश्चिंत हो गए हैं। उन्होंने खुद को नाम जपने तक सीमित कर लिया है। पिछले हफ्ते 103 रेलवे स्टेशनों का लोकार्पण एक साथ किया और इन्हें अभी से विकसित भारत के अमृत भारत स्टेशन घोषित कर दिया। फिर शनिवार को नीति आयोग की दसवींऔरऔर भी

प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी झूठ बोलें तो समझ में आता है क्योंकि उन्हें झूठ बोलने की आदत और असाध्य बीमारी है। झूठ बोलना उनका संस्कार है। यह अकारण नहीं है कि प्रधानमंत्री पद की मर्यादा को बचाने के लिए आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार उनके शासन में भारतीय संसद की कार्यवाही में झूठ शब्द को ही असंसदीय घोषित कर दिया गया। सरकार के मंत्री और भाजपा नेता झूठ बोले तो भी स्वीकार्य है क्योंकि उन्हें राजनीतिऔरऔर भी