भारतीय अर्थव्यवस्था 1980 के बाद 39 सालों में अब तक बराबर बढ़ती रही है। अगर हम उसकी विकास दर से मुद्रास्फीति की दर न घटाए और उसे सम-मूल्य पर लें तो वह अगर 1980 में 100 रुपए की थी तो अब 11,000 रुपए की हो चुकी है। 110 गुनी वृद्धि, 12.8% की सालाना चक्रवृद्धि दर। इस दौरान बीएसई सेंसेक्स कितना बढ़ा है? क्या उसके रिटर्न का कोई रिश्ता सरकारों के स्वरूप से है? अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव का पहला चरण पूरा हो गया। इसमें बीस राज्यों की 91 सीटों पर वोट डाले गए। इस हफ्ते गुरुवार, 18 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान होना है। इसमें 13 राज्यों की 97 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। देश की धुकधुकी 23 मई को आनेवाले चुनाव नतीजों पर लगी हुई है। लेकिन जो भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित ताकत को जानते हैं, उन्हें पता है कि उसका बढ़ना नहीं रुकेगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

सारा देश चुनावों के राग में डूबा हुआ है। हर तरफ राजनीति का शोर। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अभी तक हमारी अर्थव्यवस्था राजनीति की परवाह किए बिना बढ़ती रही है और उसी से जुड़ा है हमारा शेयर बाज़ार। हालांकि इधर चुनाव नतीजों की अनिश्चितता के बीच बाज़ार में छोटी कंपनियों के शेयर ज्यादा ही गिर गए हैं। लेकिन अनिश्चितता के हटते ही उनके उठने की भरपूर संभावना है। तथास्तु में आज ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल ताकत उसका घरेलू बाज़ार और खपत है। यह बाज़ार इतना बड़ा है कि भारत को कहीं बाहर झांकने की ज़रूरत नहीं। इसलिए सही मायने में कहें तो भले ही दुनिया ग्लोबल हो गई हो और माल व सेवाओं के आयात-निर्यात की खास भूमिका हो, भारतीय लोग बाहर और बाहर के लोग यहां बेधड़क आते जा रहे हों, लेकिन भारत की सेहत पर विश्व अर्थव्यवस्था का खास फर्क नहीं पड़ता। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सवाल उठता है कि आर्थिक विकास को गति देने के मामले में गठबंधन की सरकारें आखिर एकदलीय सरकारों से बेहतर काम क्यों करती हैं? इसका एक कारण यह हो सकता है कि एकदलीय सरकार को अपनी सत्ता का दंभ होता है। इसलिए वो मुठ्ठी भर नेताओं के दिमाग या सत्ता समीकरण को साधने की नीयत से मनमर्जी से नीतियां थोपती हैं, जबकि गठबंधन सरकारों को मजबूरी में सबको साथ लेकर चलना पड़ता है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी