शेयर बाज़ार के निवेश में वही कंपनी अच्छा रिटर्न देती है जिसका बिजनेस सालों-साल तक बराबर बढ़ता रहे। लेकिन इसके साथ दो शर्तें जुड़ी हैं। पहली यह कि उसने धंधे में जितनी पूंजी लगाई है, उस पर अच्छा रिटर्न कमाती रहे और दूसरी यह कि वो जितना लाभ कमाए, उसका अच्छा हिस्सा धंधे पर ही निवेश करती रहे। हम आम जीवन में भी यही देखते हैं। कोई खूब कमाए, जमकर खर्च करे। लेकिन न बचाए, न ठीकऔरऔर भी

देश में सबसे भयंकर दुर्दशा डेमोग्राफिक डिविडेंड मानी गई उस युवा आबादी की हो रही है, जिनकी आकांक्षाओं के दम पर भारत की सारी विकासगाथा लिखी गई है। हमारे 60 करोड़ देशवासियों की उम्र 25 साल से कम है। यह वो ताकत है जो देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकती है। लेकिन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की ताजा ‘इंडिया इम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024‘ के मुताबिक भारत की श्रमशक्ति में हर साल जुड़नेवाले 70-80 लाखऔरऔर भी

भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश में आर्थिक मोर्चे पर सब ठीकठीक चल रहा है। जिस कृषि क्षेत्र पर हमारी 46.1% श्रमशक्ति और करीब 65% आबादी निर्भऱ है, वो तो पहले भी भगवान भरोसे थी और अब भी रामभरोसे ही है। लेकिन जिस सेवा क्षेत्र और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर देश की विकासगाथा और विकास-यात्रा को आगे बढ़ाने का दारोमदार है, उसकी ठहरी या पस्तऔरऔर भी

देश में जीडीपी पर भरपूर हवाबाज़ी बदस्तूर जारी है। लेकिन बेरोज़गारी पर कोई बहस नहीं। मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया के तहत औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और देश को आत्मनिर्भर बनाने का दावा किया। लेकिन पिछले 11 सालों में जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का योगदान बराबर घटता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करताऔरऔर भी

भारत स्वरोज़गार-प्रधान देश पहले भी था और अब भी है। पर अभी तक किसी सरकार ने स्वरोज़गार का श्रेय लेने की जुर्रत नहीं की थी। मगर श्रेय लेने क राजनीति में ही पले-बढ़े नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने आम लोगों के स्वरोज़गार का सारा श्रेय खुद ले लिया। इसी आधार पर उनके अर्थशास्त्री गिनाते हैं कि 2014 से 2024 के दौरान देश में 17.19 करोड़ नए रोज़गार पैदा हुए हैं। यानी, हर साल औसतन 1.72 करोड़औरऔर भी