देश संस्थाओं से बनता है। संस्थाएं धीरे-धीरे सदियो में बनती हैं और उनके बनने-बनाने में पीढ़ियां खप जाया करती हैं। जो संस्थाओं को सुनियोजित ढंग से तोड़ या कमज़ोर कर रहा हो, वो देश को मजबूत नहीं, खोखला करता है। भारतीय रिजर्व बैंक 1 अप्रैल 1935 को बनी वो संस्था है जो देश के संपूर्ण मौद्रिक व बैंकिंग तंत्र की संचालक ही नही, नियामक भी है। मोदी सरकार ने 11 साल के शासन में इस सस्था कोऔरऔर भी

अगर आप शेयर बाज़ार का फायदा उठाने के बारे में गंभीर हैं तो बिजनेस अखबारों की हेडलाइंस, टीवी चैनलों की सिफारिशों और ऑनलाइन या वॉट्स-अप ग्रुप में दी जा रही टिप्स से ऊपर उठना होगा। जिस भी कंपनी के शेयर खरीदने हैं, उसके बिजनेस मॉडल और प्रबंधन की कुशलता के साथ ही यह भी समझना होगा कि वो हासिल लाभ को लगाती कहां है। कंपनी का बिजनेस ऐसा होना चाहिए जो लगाई गई पूंजी पर ज्यादा रिटर्नऔरऔर भी

बिमल जालान समिति की रिपोर्ट अगस्त 2019 में स्वीकार की गई। तब रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट 30 जून, 2019 को साल भर पहले के ₹36,17,594 करोड़ से 13.42% बढ़कर ₹41,02,905 करोड़ हो गई थी। पहले के नियम के मुताबिक इसका 6.8% हिस्सा कंटेन्जेंसी फंड या सीआरबी के रूप में रखा गया था। जालान समिति ने इसे 5.5% से 6.5% रखने का सुझाव दिया था। लेकिन शक्तिदास के गवर्नर बन जाने पर रिजर्व बैंक ने इसे 5.5%औरऔर भी

रिजर्व बैंक आरबीआई एक्ट, 1934 के सेक्शन-47 के तहत रिस्क के लिए सही प्रावधान और उचित लाभांश का फैसला करता है। बिमल जालान समिति ने यह फैसला करने का आधार ही बदल दिया। उसने एक नया आर्थिक पूंजी फ्रेमवर्क (ईसीएफ) बना डाला, जिसमें आर्थिक पूंजी को कंटिन्जेंट रिस्क बफर (सीआरबी) या रीयलाइज्ड इक्विटी और बदलते रहनेवाले वोलैटाइल री-वैल्यूएशन रिजर्व के दो हिस्सों में बाट दिया। उसने तय किया कि कंटिन्जेंट रिस्क बफर (सीआरबी) रिजर्व बैंक की बैलेंसऔरऔर भी

प्रधानमंत्री के पद पर बैठे नरेंद्र मोदी की निगाहें रिजर्व बैंक के खज़ाने पर गड़ गईं। लेकिन उस पर हाथ साफ करना आसान नहीं था क्योंकि तब तक की वैधानिक व्यवस्थाएं इसकी इजाज़त नहीं देती थीं। उसी तरह जैसे परशुराम के उंगली दिखाने पर लक्ष्मण पलटकर कहते हैं, “इहां कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं, जे तर्जनी देखि मरे जाहीं।” इससे पार पाने के लिए मोदी सरकार ने दिसंबर 2018 में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान कीऔरऔर भी