कंपनी में दम, निवेश तभी जब भाव हों कम
जो कोई शेयर बाज़ार में तीन साल से ज्यादा वक्त का लम्बा निवेश करना चाहता है, उसे यही नहीं देखना चाहिए कि कंपनी अच्छी व संभावनामय हो, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसका शेयर सस्ता हो। अन्यथा, अच्छी से अच्छी कंपनी ज्यादा भाव पर खरीद लो तो बाद में पछताना पड़ता है। इस तरह पछताने से अच्छा है कि अभी उसके शेयर को गिरकर माकूल रेंज में आने दिया जाए। मान लो कि गिरकर सही रेंजऔरऔर भी
अमेरिका में बांड खरीद घटी तो रुपया कांपेगा
अमेरिका का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व अगर नवंबर-मध्य से बांड खरीदने की रफ्तार धीमी कर देता है तो इसका क्या असर पड़ेगा? इससे पहले उसने मई 2013 में जब बांड खरीद घटाने या टैपरिंग की घोषणा की थी तो बाज़ार में अचानक ब्याज दरें बढ़ने लगीं। सरकारी बांडों पर यील्ड की दर बढ़ गई। उसने जब टैपरिंग की पूरी योजना पेश की, तब तो बांड के मूल्य इतना घट गए कि उनकी यील्ड काफी बढ़ गई। अमेरिकीऔरऔर भी
विदेशी धन पर फूला बाज़ार आखिर कब तक!
सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ने से ब्याज दर घटने लगती हैं। इससे जहां उद्योग, व्यापार व उपभोक्ताओं को सहूलियत हो जाती है, वहीं जिनके पास सीमित पूंजी है और जो एफडी या बांड जैसे ऋण-प्रपत्रों पर मिलनेवाले ब्याज की आय पर निर्भर हैं, उनके लिए मुश्किल हो जाती है। वे ज्यादा रिटर्न पाने के लिए रिस्की निवेश माध्यमों की तरफ जाने को मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि अमेरिका, यूरोप व जापान जैसे विकसितऔरऔर भी
नोट छापे बगैर ही बढ़ जाता है धन का प्रवाह
किसी भी देश का केंद्रीय बैंक सरकारी बांड व प्रतिभूतियां खरीदता है तो सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ जाता है और धन की लागत या ब्याज दर घट जाती है। उद्योग व व्यापार जगत इसका लाभ उठाते हैं। अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक ऐसा हो चुका है। अपने यहां भी रिजर्व बैंक से सिस्टम में धन का प्रवाह बढ़ाने की मांग होती रही है। इसमें केंद्रीय बैंक को नोट नहीं छापने पड़ते, बल्कि बढ़ीऔरऔर भी







