बाज़ार में उभरते स्टॉक्स पर ही लगते हैं दांव
छठ पर्व में भले ही डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता हो। लेकिन शेयर बाजार में हमेशा उगजे सूरज को ही ट्रेडिंग के लिए चुना जाता है। शॉर्टसेल भा उन्हीं स्टॉक्स में की जाती है जिनके सितारे कुछ समय पहले तक बुलंद थे। कम से कम प्रोफेशनल ट्रेडरों का तो यही रवैया रहता है। बाज़ार में कई सॉफ्टवेयर हैं जो सारे स्टॉक्स में से छांटकर बता देते हैं कि कौन-से स्टॉक्स में साल से लेकर महीने औरऔरऔर भी
सरकारी बांड रिस्क-फ्री, शेयर हैं पूरे रिस्की!
रिजर्व बैंक ने अंततः वह स्कीम शुरू ही कर दी जिसके जरिए आम लोग सीधे-सीधे सरकारी बांडों में निवेश कर सकते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि जब उन्हें पीपीएफ में 7.1%, किसान विकास पत्र में 6.9%, एनएससी में 6.8% और सुकन्या समृद्धि योजना में 7.6% सुरक्षित सालाना ब्याज मिल रहा है तो वे 6.3% पाने के लिए सरकारी बांडों का रुख क्यों करेंगे? कुछ जानकार बताते हैं कि केंद्र सरकार को इस साल 12.5 लाख करोड़औरऔर भी
यहां हर दूसरे ट्रेडर से होड़, टकराता है स्वार्थ!
शेयर बाज़ार के ट्रेडर को हमेशा होश रहना चाहिए कि उसे दिमाग का योद्धा बनना है। इसमें अगर वह महारथी बन गया तो न केवल उसकी पूंजी हमेशा सलामत रहेगी, बल्कि नियमित रूप से बढ़ती भी रहेगी। हम अपना युद्ध अपनी सोच के दम पर लड़ते हैं, न कि तेज़ इंटरनेट कनेक्शन या शानदार ट्रेडिंग टर्मिनल के दम पर। यह भी याद रहे कि यहां हर किसी के अपने स्वार्थ हैं और हर कोई हर दूसरे काऔरऔर भी
वहां मांग-आपूर्ति असीमित, यहां बंधी आपूर्ति!
कुछ लोग कमोडिटी या जिंस बाज़ार को शेयर बाज़ार से जोड़कर देखते हैं। वे भूल जाते हैं कि कमोडिटी बाज़ार में भाव सीधे-सीधे मांग व आपूर्ति के संतुलन से तय होते हैं और इसमें मांग व आपूर्ति की कोई सीमा नहीं होती। वे असीमित हद तक जा सकती हैं। लेकिन शेयर बाज़ार में हर कंपनी के शेयरों की चुकता पूंजी सीमित है। उसकी आपूर्ति नहीं बढ़ाई जा सकती है। मगर, मीडिया में माहौल बनाकर उसके शेयर कीऔरऔर भी







