हर बड़ी कंपनी अच्छी नहीं होती और हर छोटी कंपनी खराब नहीं होती। यह अलग बात है कि एफआईआई जैसे बड़े निवेशकों के लिए छोटी कंपनियां उस ‘मछली जल की रानी है’ की तरह होती हैं जिन्हें ‘हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी।’ असल में इन कंपनियों की इक्विटी बेहद कम होती है जबकि एफआईआई की न्यूनतम खरीद भी अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती है। उनके घुसते ही ऐसी कंपनियों के शेयर चढ़ जाते और निकलतेऔरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए कौन-से स्टॉक्स चुनें, इसका फैसला हमेशा मुख्य सूचकांकों में से किया जाना चाहिए। निफ्टी-50 नहीं तो नेक्स्ट-50 पर नज़र डालें। इसी तरह मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों से होते हुए अलग-अलग उद्योग व सेवा क्षेत्र के सूचकांकों तक उतर जाएं। इनमें से भी सही स्टॉक्स न मिलें तो निफ्टी-50 एल्फा तक चले जाएं। हालांकि, इस वक्त सबसे बड़ी दिक्कत है बाज़ार में चल रही भारी सट्टेबाज़ी, जिसके केंद्र में हैं रिटेल ट्रेडर। बीते डेढ़-दो सालऔरऔर भी

लम्बे निवेश का फंडा एकदम अलग है और ट्रेडिंग का एकदम अलग। ट्रेडिंग में कंपनी के ईपीएस, बुक वैल्यू और स्टॉक के पी/ई व पी/बी अनुपात का कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां तो बस इतना देखना पड़ता है कि धन का प्रवाह किन स्टॉक्स का पीछा कर रहा है और किनसे दूर भाग रहा है। खासकर, एफआईआई का रुख क्या है? यह भी कि इस दौरान एचएनआई और प्रोफेशनल ट्रेडरों का क्या व्यवहार है? डीआईआई तो हमेशाऔरऔर भी

अमूमन इंट्रा-डे ट्रेडर के लिए वही स्टॉक्स माफिक होते हैं जो 52 हफ्तों के शिखर से 2-4% नीचे हों। ऐसे स्टॉक्स निफ्टी-50 से लेकर नेक्स्ट-50 और दूसरे सूचकांकों में साफ देखा सकता है। इन्हें देखकर ट्रेडर को अपना-अपना नियम-कायदा या अल्गोरिदम लगाना पड़ता है। लेकिन चूंकि स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेडर कम से कम 5-10% कमाने के लिए ट्रेड करते हैं तो 52 हफ्ते के शिखर से 2-4% नीचे चल रहे स्टॉक्स उन्हें नहीं जमते। उन्हें तोऔरऔर भी