कुछ लोगों का दिमाग बड़े रैखिक तरीके से चलता है। वे हिसाब लगाते हैं कि कोई शेयर या सूचकांक महीने में 10% बढ़ा तो छह महीने में 60% और दस महीने में 100% बढ़ जाएगा। लेकिन यह सांख्यिकी तक का भ्रमजाल है और शेयर बाज़ार में तो ऐसा हिसाब-किताब चलता ही नहीं। अब तक ऐसा हुआ है तो आगे उसी दिशा में ऐसा-ऐसा होगा, कोई ट्रेडर अगर ऐसा सोचकर चले तो समझ लीजिए कि उसका विनाशकाल शुरूऔरऔर भी

भारत जैसे उभरते देशों के शेयर बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश बनकर आ रहे धन का प्रवाह कुछ महीनों में टूट सकता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व द्वारा बॉन्ड की खरीद कम किए जाने से सिस्टम में धन की उपलब्धता घटेगी और ब्याज दर बढ़ेगी। नतीजतन, उसका प्रवाह धीमा पड़ेगा। फिर भी विदेशी धन ज्यादा रिटर्न की चाह में निश्चित रफ्तार से आता रहा तो भारत जैसे शेयर बाज़ार पहले की तरह कुलांचे मारते रहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार की तेज़ी या मंदी एकतरफा नहीं होती। उसका ग्राफ कभी एकदम सीधी रेखा में नहीं चलता। एक स्तर पर पहुंचने के बाद वह टूटता है, दिशा बदलता है और नया चक्र शुरू हो जाता है। इन चक्रों के ऊपर कोई सुपर-चक्र नहीं होता जो लगातार लम्बे समय तक एक ही दिशा में बढ़ता चला जाए। बाज़ार में मार्च 2020 के बाद तेज़ी का जो चक्र चल रहा है, वह भी देर-सबेर टूटेगा, दिशा बदलेगा। यहऔरऔर भी

शेयर बाज़ार को प्रभावित करनेवाले सारे कारक सही-सही पता हों तो उसकी भावी दशा-दिशा निकाली जा सकती है। यह कोई रॉकेट साइंस या चमत्कार नहीं, बल्कि सीधा-सीधा गणित है। अंकगणित नहीं तो बीजगणित से लेकर लीनियर अल्जेबरा व कैल्कुलस तक से हम सटीक गणना कर सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि शेयर बाज़ार में एक कारक अज्ञात है जिसका बहुत हुआ तो अनुमान भर लगा सकते हैं। वो है यहां सक्रिय इंसानों को मनोविज्ञान। हमें अपनाऔरऔर भी