अगर आप ट्रेडर हैं तो आपको शेयर बाज़ार के उन्मादी स्वभाव से पार पाने की कला विकसित करनी पड़ेगी। लेकिन अगर आप लम्बे समय के निवेशक हैं तो इसको लेकर आपको खास चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि तीन से पांच साल या इससे ज्यादा वक्त में शेयर बाज़ार का अंतिम स्वभाव अच्छी कंपनियों में हो रहे मूल्य सृजन को सामने लाने का रहा है। हां, निवेश से पहले आपको कंपनी के बिजनेस, उसके पीछे सक्रिय उद्यमी केऔरऔर भी

विशाल बाज़ार होने के बावजूद भारत जैसा विकासशील देश तब तक विकसित नहीं बन सकता, जब तक वह शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं विकसित कर लेता। यह हासिल कर पाना बेहद कठिन चुनौती है। भारत इसे 1947 में आज़ाद होने से लेकर 1991 में आर्थिक उदारीकरण का खुलापन अपनाने और उसके बाद भी अब तक के तीस सालों में झेलता रहा है। कारण, अर्थव्यवस्था का आधारभूत तंत्र बनाने में बहुत ज्यादा पूंजी बहुत ज्यादा समय तक लगानी पड़ती है। इस पर चूंकि रिटर्न बहुत ज्यादा समय में आता है, इसलिए फटाफट मुनाफा कमाने की फितरत वाला निजी क्षेत्र इसमें निवेश करने के लिए आगे नहीं आता। बैंक भी आधारभूत संरचना बनाने के लिए ऋण देने से कतराते हैं क्योंकि कम समय के डिपॉज़िट को वे ज्यादा समय के ऋण में फंसाने का जोखिम नहीं उठा सकते। आज़ादी के तुरंत बाद भी ऐसा हुआ और अब भी ऐसा ही हो रहा है। इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का अधिकांश काम भारत सरकार को ही करना पड़ा है।और भी

अमेरिका से लेकर यूरोप, जापान, चीन जैसे बड़े देशों के अलावा सिंगापुर व मॉरीशस और तमाम छोटे देशों से काम कर रहे हैं करोड़ों ट्रेडर। फिर भारत के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय लाखों ट्रेडर। जिस तरह पेड़ों से ही जंगल बनता है, मगर जंगल का सम्मिलित स्वभाव अलग होता है, उसी तरह दुनिया के कोने-कोने से करोड़ों ट्रेडरों व निवेशकों से मिलकर बना शेयर बाज़ार का सामूहिक स्वरूप अलग होता है। रिटेल ट्रेडर व निवेशक तो शेयरऔरऔर भी

दुनिया के सफलतम निवेशक वॉरेन बफेट के गुरु बेंजामिन ग्राहम ने शेयर बाजार के लिए ‘मिस्टर मार्केट’ शब्द ईजाद करते हुए कहा था कि वह ऐसा काल्पनिक निवेशक है जो घबराहट, उन्माद व उदासीनता के भावों से भरा है। किसी उन्मत्त पागल जैसा उसका स्वभाव है जो कभी भी आशा व निराशा के मूड के बीच झूलने लगता है। एक आम निवेशक या ट्रेडर भी बाज़ार के इस स्वभाव की तस्दीक कर सकता है। लेकिन कल्पना केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में जबरदस्त जुनून छाया है। इसे उन्माद या पागलपन भी कह सकते हैं। ऐसा नहीं होता तो जब निफ्टी 25.47 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, तब जुबिलैंट फूडवर्क्स 130.86 के पी/ई अनुपात पर नहीं ट्रेड हो रहा होता। कभी बैंकिंग व फाइनेंस स्टॉक्स को चढ़ाया जाता है तो कभी मेटल व रियल्टी स्टॉक्स को। मुठ्ठी भर ऑपरेटरों की मौजूदा रणनीति यह है कि चुनिंदा स्टॉक्स को धन का प्रवाह बढ़ाकर चढ़ाते जाओऔरऔर भी