हर निवेशक या ट्रेडर रिटर्न का भूखा होता है। विदेशी निवेशक तो खासकर। अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान तक के निवेशक विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफआईपी) के जरिए भारत से हर साल कम से कम 10-12% रिटर्न कमा रहे हैं जो उनके लिए अपने देश की तुलना में बहुत-बहुत ज्यादा है। वो भी मुद्रा उतार-चढ़ाव के रिस्क को मिटाकर क्योंकि रुपया डॉलर के मुकाबले बराबर 74-75 की रेंज में चल रहा है। विदेशी निवेशकों ने हमारे शेयरऔरऔर भी

सब कुछ जानते हुए भी डर तो लगता ही है। डरना और लालच करना इंसान का मूल स्वभाव है। शेयर बाज़ार में आनेवाले डर और लालच के दो ध्रुवों में खिंचे रहते हैं। एक तरफ लालच में फंसकर क्रिप्टो के जाल में फंस जाते हैं। दूसरी तरफ हिसाब लगाते हैं कि साल 2008 में रिलायंस पावर के आईपीओ के धमाके के बाद बाज़ार धराशाई हो गया था। इस बार तो ज़ोमैटो, नायिका और पेटीएम के आईपीओ केऔरऔर भी

जो निवेशक या ट्रेडर शेयर बाज़ार के मूल स्वभाव को समझते हैं, वे न तो उन्माद में उतराते हैं और न ही अवसाद में डूबते हैं। वे कभी न कयास में फंसते हैं और न भविष्यवाणियों से उलझते हैं। वे रिस्क और रिटर्न का अपना हिसाब दुरुस्त रखते हैं और हमेशा समभाव में रहते हुए मस्त रहते हैं। ट्रेडर जानता है कि यह ज़ीरो-सम गेम है। किसी के खाते का धन ही उसके खाते में आना है।औरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में 21 महीने से चल रही तेज़ी क्या कुछ दिनों के झटके के बाद वापस लौट आई है या नहीं? यह तेज़ी कहां तक जाएगी? कब इसमें बड़ा करेक्शन आ सकता है? कहीं बाज़ार 20% गिरकर तेज़ी से मंदी की गिरफ्त में न चला जाए! कयास लगाने और भविष्यवाणियां करनेवालों की कोई कमी नहीं। इनके पीछे भागेंगे तो कहीं चैन नहीं मिलेगा। वहीं, इनके भंवरजाल से मुक्त होकर देखें तो दो बातें पक्के तौरऔरऔर भी