मोदी सरकार की विशेषता यह है कि उसने अर्थव्यवस्था के हिसाब-किताब में सतही को असली और असली को नकली बना दिया है। पहले हम नॉमिनल जीडीपी के बजाय रीयल जीडीपी और उसकी विकास दर को देखते थे। लेकिन रीयल विकास दर अब इतनी नकली हो गई है कि असली तस्वीर जानने के लिए नॉमिनल या सतह पर तैरती विकास दर को देखना पड़ता है। लेकिन यह करतब भी काम नहीं कर रहा। चालू वित्त वर्ष 2025-26 मेंऔरऔर भी

अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ व विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के लिए देश का राजकोषीय घाटा, खासकर जीडीपी से उसका अनुपात बड़ा पवित्र मानक होता है। अपने यहां इसके ऊपर से एफआरबीएम एक्ट के तहत 31 मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3% तक ले आना था। कोरोना महामारी के चलते यह लक्ष्य नहीं पूरा हो सका। अब सरकार ने इसे 2030 तक खिसका दिया है। इस बार 1 फरवरी को बजट पेश हुआ तो वित्तमंत्री निर्मलाऔरऔर भी

जीडीपी की नई सीरीज़ में जो पद्धति अपनाकर गणना की गई है, उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बड़बोले मंत्रियों व नेताओं की बोलती बंद कर दी है। 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का दावा करनेवालों के लिए अब 4 ट्रिलियन की बात करना भी मुश्किल हो गया है। पुरानी पद्धति के अनुसार जनवरी में आए पहले अग्रिम अनुमान वित्त वर्ष 2025-26 में नॉमिनल या वर्तमान मूल्यों पर जीडीपी ₹357.14 लाख करोड़ निकाला गया था। वहीं, नई सीरीज़औरऔर भी

जब दुनिया एप्सटीन फाइलों के खुलासों से निकलकर अमेरिका व इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपे गए युद्ध के चलते समूचे मध्य-पूर्व मे फैली अशांति में उलझी हुई थी और हम देश में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति का हिसाब लगा रहे थे, उसके ठीक पहले सरकार ने अर्थव्यवस्था या जीडीपी के साथ बड़ा खेला कर दिया। उसने राष्ट्रीय खातों के डेटा की नई सीरीज़ जारी कर दी, जिसमें जीडीपी और जीवीए की गणना का आधार वर्षऔरऔर भी

आम जीवन की तरह निवेश की दुनिया में भी धारणाए व मान्यताएं हकीकत से टकराकर बराबर टूटती रहती हैं। इसलिए धारणाओं और मान्यताओं से चिपके रहना गलत है। 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल ने ईरान पर हमला किया तो शुरू में जानी-समझी प्रतिक्रिया हुई। शेयर बाज़ार गिर गए, मुद्राएं कमज़ोर पड़ गई और जिंसों के दाम बढ़ गए। सोने के दाम खटाक से 2.15% और चांदी के दाम 1.63% बढ़ गए। कहा जाने लगा कि देश में सोनाऔरऔर भी