बाज़ार चाहे चढ़े आकाश या डूबे रसातल
शेयर बाज़ार आशा और निराशा की अतियों के बीच झूलता है। अनिश्चितता के मौजूदा दौर में कुल लोग कह रहे हैं कि सेंसेक्स 1,50,000 तक चला जाएगा तो कुछ का मानना है कि वो 40,000 तक गिर सकता है। यह भी सच है कि बाज़ार को सामान्य या अनुमानित घटनाएं नहीं, बल्कि अचानक होनेवाला अचम्भा बड़ा झटका देता है। लेकिन अच्छी कंपनियों का धंधा बाज़ार को लगनेवाले झटके के बीच भी शांत व सहज गति से बढ़ताऔरऔर भी
आगे संकटकाल देख भाग रहे विदेशी!
सवाल उठता है कि जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) दशकों से भारत पर लट्टू रहे हैं, नोटबंदी की तंगी और कोरोना की तगड़ी मार के बीच भी जिन्हें भरपूर उम्मीद थी, वे अब यहां से क्यों किनारा कसने लगे हैं? भारतीय शेयर बाज़ार में छह महीनों से जिस तरह उन्होंने भयंकर मुनाफावसूली की है, वह अभूतपूर्व है। जानकारों के मुताबिक एफपीआई को लगता है कि जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करनेवाला भारत दुनिया में कच्चेऔरऔर भी
कितने देशों के कितने जाल हैं भारत में!
दुनिया के कौन-से देश है जहां से एफपीआई के रूप में सबसे ज्यादा धन भारत के वित्तीय बाज़ार में आता है? भारत में निवेश करनेवाले शीर्ष 10-11 देशों में अमेरिका टॉप पर है। उसके बाद मॉरीशस, लक्ज़मबर्ग, सिंगापुर, ब्रिटेन, आयरलैंड, कनाडा, जापान, नॉरवे, फ्रांस व नीदरलैंड्स (हॉलैंड) का नंबर है। ध्यान दें कि इसमें यूरोप की प्रमुख अर्थव्यवस्था जर्मनी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन का नाम नहीं है। इसकी एक वजह तो है किऔरऔर भी
घरेलू बचत उड़ाकर ले जा रहे हैं विदेशी!
विदेशी पोर्टपोलियो निवेशक (एफपीआई) तो प्रवासी पक्षियों की तरह हैं जहां अनुकूल मौसम जितने समय के लिए मिलेगा, वहां उतने समय के लिए चले जाएंगे। एफपीआई को कम से कम रिस्क में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। उन्हें भारत से कोई विशेष अनुराग नहीं है। जहां ज्यादा मुनाफा मिलेगा, उधर का ही रुख कर लेंगे। जान लें कि भारत को अपने शेयर व वित्तीय बाज़ार की चमक बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा एफपीआई कीऔरऔर भी







