शेयर बाज़ार लिस्टिंग कंपनियों के उठते-गिरते भावों का ही खेल है। यहां आधे से ज्यादा सौदे तो सटोरियों के होते हैं, जिनका सचमुच खरीदने-बेचने से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो बस भाव बोलते हैं और दिन के दिन में भावों का अंतर काटकर निकल जाते हैं। मसलन, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज़ में डिलीवरी वाले सौदे 45.44%, विप्रो में 42.19%, टाइटन में 46.67% और भारती एयरटेल में 33.59% ही थे। वैसे, डिलीवरी वाले सौदों का आधे सेऔरऔर भी

आज के दौर में सबसे मुश्किल काम है कमाना। दिक्कत यह है कि काम ही नहीं मिल रहा तो कमाएंगे कैसे? कहते हैं कि खोजने पर तो भगवान भी मिल जाता है। फिर काम कैसे नहीं मिलेगा? लेकिन करोड़ों लोगों को लाख खोजने पर भी काम नही मिल रहा। कमाने के बाद की कड़ी है बचाना। बचाने के बाद उसे बढ़ाना।  की जुगत। बचत को कहीं लगाया नहीं तो मुद्रास्फीति दीमक की तरह खा जाएगी। इसलिए उसेऔरऔर भी

डर इस बात का है कि जरा-सी आशा और गहरी निराशा के बीच डूबते-उतराते शेयर बाज़ार में सालोंसाल से ट्रेड कर रहे प्रोफेशनल व रिटेल ट्रेडर कहीं अंततः हाथ न खड़ा कर दें। बोल पड़े कि यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो। ट्रेडरों के लिए इसका कोई व्यावहारिक समाधान तो नहीं नज़र आता। लेकिन विकल्प हो तो उन्हें कुछ समय के लिए निवेशक बन जाना चाहिए। बाजार का कोई भरोसा नहीं। मंदी के माहौल मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के ट्रेडर का यूं फ्यूचर्स को छोड़ ऑप्शंस की तरफ भागना काफी चिंताजनक है। कारण यह है कि ऑप्शंस को खरीदना भले ही फ्यूचर्स की तुलना में बहुत सस्ता हो, लेकिन ऑप्शंस में घाटे की खोह बहुत गहरी और उसकी गणना काफी जटिल है, जबकि फ्यूचर्स में घाटे की गणना सीधी-सरल व आसान है। निफ्टी फ्यूचर्स में एक समय तीन ही सीरीज अपलब्ध होती है। जैसे अभी जुलाई, अगस्त व सितंबर की सीरीज में सौदेऔरऔर भी

भाव कोई भगवान नहीं तय करता। शेयर बाज़ार में भाव वही होते हैं जो ट्रेडर देने को तैयार होते हैं। इस समय निफ्टी फ्यूचर्स का भाव स्पॉट से बहुत मामूली प्रीमियम या डिस्काउंट तक पर इसलिए चल रहा है क्योंकि फ्यूचर्स में हर दिन मार्क-टू-मार्केट का सिस्टम है और ट्रेडर मार्क-टू-मार्केट घाटा उठाने की न तो स्थिति में हैं और न ही इसके लिए तैयार हैं। वे बहुत हाथ-पैर मार रहे हैं। लेकिन इस दुर्दशा से निकलनेऔरऔर भी