भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन को सही मानें तो देश का जीडीपी सरकारी अनुमान से 22% कम हो सकता है। अभी जीडीपी की नई सीरीज़ के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2025-26 में हमारा रीयल जीडीपी 322.58 लाख करोड़ रुपए और नॉमिनल जीडीपी 345.47 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। इससे 22% कम तो रीयल जीडीपी 251.61 लाख करोड़ रुपए और नॉमिनल जीडीपी 269.47 लाख करोड़ रुपए निकलता है। सुब्रमण्यन के आकलन को एकऔरऔर भी

जीडीपी महज संख्या नहीं होती। वो देश की बेहतरी और बढ़ती खुशहाली का पैमाना है। लेकिन इसे मात्र आकार तक सीमित कर देना इसकी व्यापकता को कम कर देता है। बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसा पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। इसलिए तमाम देश जीडीपी से कहीं ज्यादा अहमियत देश में प्रति व्यक्ति आय को देते हैं, जिसे जीडीपी को आबादी से भाग देकर निकाला जाता है। लेकिन अपने यहां जीडीपी कोऔरऔर भी

मध्य-पूर्व में तात्कालिक युद्ध-विराम से शेयर बाज़ार की सांस थोड़ी सामान्य हो गई। लेकिन मार्च महीने में जिस तरह एनएसई का निफ्टी-50 सूचकांक 11.31% और बीएसई का सेंसेक्स-30 सूचकांक 11.49% टूटा है, उससे इन सूचकांकों में शामिल ब्लूचिप कंपनियों के शेयर सस्ते हो गए तो सहज लालच का भाव जागा कि क्यों न ऐसी कंपनियों को लपक लिया जाए। म्यूचुअल फंड स्कीमों के मैनेजर भी सूचकांकों को बेंचमार्क बनाकर चलते हैं। उनकी सफलता का पैमाना यही हैऔरऔर भी

सरकार विकास कर नहीं रही। विकास का झांसा दे रही है। सरकारी अर्थशास्त्री आपको समझाएंगे कि छोटे किसानों के लिए बजट में भारत-विस्तार की नई योजना है, जिसमें विस्तार का मतलब है वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज़, ऐसा बहुभाषी एआई टूल जो हमारी कृषि का उद्धार कर देगा। दलाल पत्रकार और भांट भी बताएंगे कि विकसित भारत@2047 नारा नहीं, सचमुच का रोडमैप है। इनके तिलिस्म को तोड़ने के लिए आज हमें इस तंत्र का हिसाबऔरऔर भी