अच्छी बात यह है कि अपने यहां ग्रेजुएट युवक-युवतियां थक-हारकर घर बैठ जाने के बजाय नौकरी मांगने के लिए श्रम बाज़ार में पहले से ज्यादा उतरने लगे हैं। हालांकि आमतौर पर काम मांगनेवाले श्रमिकों का श्रम बाज़ार में आना घटा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में श्रम भागीदारी की दर (एलपीआर) वित्त वर्ष 2016-17 में 46.2% हुआ करती है। यह बीते वित्त वर्ष 2022-23 में घटकर 39.5% पर आ गई है। लेकिन बेरोज़गारी की ऊंची दरऔरऔर भी

शिक्षा का स्तर बढ़ने से श्रम भागीदारी की दर बढ़ जाती है। लेकिन इसी के साथ बेरोज़गारी की दर भी बढ़ती जाती है। मसलन, 5वीं तक पढ़े लोगों में बेरोज़गारी की दर महज 1% है, जबकि उनकी श्रम भागीदारी दर 30% है। छठीं से नौवीं तक पढ़े लोगों की श्रम भागीदारी 37.6% और बेरोजगारी 2% से कम है। जो 10वीं से 12वीं तक पढ़े हैं, उनकी श्रम भागीदारी 40% और बेरोज़गारी 10.9% है। ग्रेजुएट्स की श्रम भागीदारीऔरऔर भी

जो जितना ज्यादा पढ़-लिख लेता है, उसे देश के भीतर काम मिलना उतना ही मुश्किल हो जाता है। इसकी तस्दीक करते हैं बेरोज़गारी के आंकड़े। सीएमआईई के मुताबिक, भारत में बेरोज़गारी की औसत दर 7.5% चल रही है। लेकिन अगर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट व इंजीनियरों वगैरह की बेरोजगारी को अलग से गिनें तो उनका आंकड़ा 17.2% निकलता है। यूं तो जिनकी अधिकतम पढ़ाई 10वीं से 12वीं तक हुई है, उनमें भी ज्यादा बेरोज़गारी है, फिर भी उनकीऔरऔर भी

हमारा पूंजी बाज़ार बम-बम कर रहा है। एनएसई दुनिया में पहले नंबर का डेरिवेटिव्स एक्सचेंज बन चुका है। लेकिन जिस श्रम की बूंद-बूंद से पूंजी बनती है, उसी श्रम बाज़ार की हालत खस्ता है। इसमें कम पढ़े-लिखे लोगों को काम मिल जाता है। लेकिन उच्च शिक्षा की अवहेलना होती है। हुआ यह कि अपने यहां 1990 के दशक के उत्तरार्ध में उच्च शिक्षा जमकर बढ़ी। इंजीनियरिंग कॉलेज खूब खुले ताकि आईटी इंजीनियरों की मांग पूरी की जाऔरऔर भी

शेयर का भाव देखकर नहीं पता चलता कि वह सस्ता है या महंगा। 5 रुपए का भी कोई शेयर महंगा हो सकता है और 5000 रुपए का शेयर भी सस्ता। शेयर महंगा है या सस्ता, इसका सबसे प्रचलित पैमाना है पी/ई अनुपात, मतलब शेयर का भाव कंपनी के प्रति शेयर लाभ (ईपीएस) से कितना गुना चल रहा है या बाज़ार कंपनी के प्रति शेयर एक रुपए के लाभ के लिए कितना दाम देने को तैयार है। दूसराऔरऔर भी