बीस साल बाद हश्र इंडिया शाइनिंग जैसा
ऐसा नहीं कि हमने प्रगति व उन्नति नहीं की है। हमारी आधी से ज्यादा आबादी तो उस समय जन्मी भी नहीं थी, जब 1991 में देश दिवालियापन की कगार पर था। हमारे नाकारा नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों ने तब तक अर्थव्यवस्था को बरबाद कर दिया था। दिक्कत यह है कि तीन दशक बाद खोखली बातों व नारों से हम अपनी अर्थव्यवस्था को चीन जैसी मजबूत नहीं, बल्कि पाकिस्तान जैसी खोखली बनाते जा रहे हैं, जहां आटे कीऔरऔर भी
विदेशी नहीं, अपनी पूंजी को बढ़ाना होगा
राष्ट्रीय उद्योगों को बढ़ाने और विदेशी पूंजी को अपने हित में इस्तेमाल करने की जो रणनीति चीन से दशकों से अपना रखी है, भारत को भी विदेशी माल व सेवाओं का बाज़ार बनने और विदेशी पूंजी को बेहिसाब छूट देने के बजाय राष्ट्रीय पूंजी व उद्योगों को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनानी होगी। तब तक हमें झूठी प्रशस्ति या निंदा नहीं, बल्कि सच्चाई का सामना करना पड़ेगा। भारतीय अर्थव्यस्था का आकार अभी बमुश्किल 4 ट्रिलियन (लाख करोड़)औरऔर भी
राष्ट्रीय उद्यमों के बल पर ही बढ़ा है चीन
क्या भारत चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को खत्म करके सरप्लस की स्थिति हासिल कर सकता है? धारणा फैलाई जाती है कि यकीनन ऐसा संभव है। हाल ही में भारत ने यही दिखाने के लिए चीन से हो रहे कंप्यूटर उत्पादों के आयात पर बंदिशें लगा दी थीं। लेकिन तुरंत उन्हें उठा लिया गया। लेकिन असल में भारत-चीन के बीच अभी जो व्यापारिक संतुलन है, उसे दुरुस्त करना न तो दो-चार साल में संभव है औरऔरऔर भी
जनता में तौहीन, पर सरकार पूरी दंडवत
सरकार ने पाकिस्तान ही नहीं, चीन को भी दुश्मन श्रेणी का देश प्रचारित कर रखा है। चीन के खिलाफ जनता में माहौल बनाया जाता है। लेकिन सरकार ने व्यापारिक रिश्तों में चीन को बड़ी तवज्जो दे रखी है। चीन ने लद्दाख में तीन साल से हमारी लगभग 2000 किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है। लेकिन सरकार इस पर चुप्पी साधे बैठी है। यही नहीं, वह चीन से आयात बढ़ाती जा रही है। भारत के आयात मेंऔरऔर भी






