चमक-दमक नहीं, हकीकत पर रहे नज़र
निफ्टी-50 सूचकांक दो दिन पहले पहली बार 25,000 अंक के पार चला गया। क्या इसका वास्ता जीडीपी के बढ़ते आंकड़ों से है? हो सकता है। लेकिन इसका बड़ा वास्ता बाज़ार में सट्टेबाज़ी की नीयत से आए धन के भारी प्रवाह से भी है। कारण, जीडीपी के बढ़ते आंकडों के पीछे छिपी हकीकत यह है कि आमजन की खपत पर टिकी कंपनियों का धंधा ठहरा पड़ा है। जीडीपी की चमक ऐसी कंपनियों के लिए फीकी है। सरकारी कृपा,औरऔर भी
ताज़ा सबूत अंधेर नगरी, चौपट राजा के!
दावा कुछ और, ज़मीनी सच्चाई कुछ और। आंकड़ों की रंग-बिरंगी चादर लहराकर बदरंग हकीकत को ढंका जा रहा है। सवाल उठा कि 2023-24 में हमारा जीडीपी सचमुच 8.2% बढ़ा है तो रोज़ी-रोज़गार क्यों नहीं बढ़ा? रिजर्व बैंक ने फौरन रिपोर्ट निकाल दी कि बीते साल रोज़गार में 4.67 करोड़ का रिकॉर्ड इज़ाफा हुआ है। अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एसबीआई रिसर्च रिपोर्ट का हवाला देते हुए कह रही हैं कि 2014 से 2023 के दौरान देश मेंऔरऔर भी
जो हैं बेवफ़ा, उन्हीं से वफ़ा की उम्मीद?
देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र का एक ही सूत्र और मंत्र है अपना मुनाफा अधिकतम करते जाना। इसी पर उनका समूचा वजूद टिका है। मुनाफा घटता जाए तो वे एक दिन हाथ खड़ाकर दीवालिया हो जाते हैं। फिर भी वित्त मंत्री उन पर कृपा बरसाने से बाज़ नहीं आ रहीं। साथ ही देश को झांसा देती जा रही हैं कि देशी-विदेशी कंपनियों पर जितनी कृपा बरसेगी, वे उतना ही निवेश करेंगी और रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे। लेकिनऔरऔर भी
बचत तहलटी पर, टैक्स वसूली चरम पर
करोडों बेरोजगारों के लिए रोज़ी-रोज़गार के अवसर और रोज़ी-रोज़गार में लगे लोगों की आय व बचत को बढ़ाना। यही हमारी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे सुलझाने से ही देश में मांग या खपत बढ़ेगी, जिससे निजी क्षेत्र नया पूंजी निवेश करेगा। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को लगता है कि स्टैंडर्ड डिडक्शन ₹50,000 से बढ़ाकर ₹75,000 कर देने और टैक्स-स्लैब में मामूली फेरबदल कर देने से अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ जाएगी। इससे 15 लाख सेऔरऔर भी






