भारत के जन-जन, बच्चे से लेकर बूढ़े व भिखारी तक प्रत्यक्ष व परोक्ष टैक्स राजस्व सरकार को देते हैं। टैक्स से बनी आस्तियां बेचकर सरकार अतिरिक्त धन जुटाती है। जन-जन की जमा और बचत से ही वो 99% ऋण हासिल करती है। यही नहीं, देश के बाहर कमाने गए अनिवासी भारतीय (एनआरआई) अगर विदेशी मुद्रा भेजना बंद करें तो भारत सरकार भयंकर भुगतान संतुलन के संकट में फंस सकती है। सरकार ने जो नीतियां बना रखी हैं, उसके चलते कच्चे तेल के आयात पर हमारी निर्भरता 2015 से 2025 तक के दस सालों में 84% से बढ़कर 90% हो गई है। इस दौरान देश के कुल आयात में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का हिस्सा 10% से बढ़कर 17% हो चुका है। सोना तो हाशिये और दिखाने की चीज़ है। कमाल है कि आत्मनिर्भर भारत के सरकारी नारे के बीच देश की आयात निर्भरता बढ़ गई है। प्रमाण यह है कि 2015-16 से 2025-26 तक के दस सालों में माल व सेवाओं को साथ मिलाकर भी देश का व्यापार घाटा 53.86 अरब डॉलर से बढ़कर 119.31 अरब डॉलर हो गया है। देश में आ रहा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सूख चुका है, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफडीआई) भागता ही जा रहा है। ऐसे में सोचिए कि एनआरआई ने भारत में वित्त वर्ष 2023-24 में 137 अरब डॉलर और 2024-25 में 136 अरब डॉलर न भेजे होते तो क्या होता? अब शुक्रवार का अभ्यास…
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