छोटे हो चले हैं अब लम्बे निवेश के साल!

हालात लगातार बदलते हैं। धारणाएं उनका पीछा करती हैं। अगर हम सच्चाई के हिसाब से धारणाएं न बदलें तो समय हमें रौंदकर आगे बढ़ जाता है। इसलिए समय के साथ या उससे आगे चलने के लिए हमें धारणाओं को लगातार अपडेट करते रहना पड़ता है। जैसे, अभी तक माना जाता है कि शेयर बाज़ार में संभावनामय कंपनी चुनकर निवेश करो और 10-15 साल भूल जाओ। इसे ही दीर्घकालिक निवेश माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से कंपनियां जिस परिवेश में काम कर रही हैं, उसमें उनका प्रबंधन अगर नई पहल नहीं करता तो तीन-चार साल में ही कंपनी का भुरकुस निकल जाता है। आप पाते हैं कि तीन-चार साल में ही सोच-विचार कर खरीदा स्टॉक 30-40% घाटा दे रहा है। एआई ने वैसे भी बदलाव की रफ्तार बहुत बढ़ा दी है। टेक्नोलॉज़ी में जब भी नया कुछ होता है तो कंपनियों का धंधा प्रभावित होता है। भारत के लिए विशेष परिस्थिति यह है कि चीन हमारी पूरी मैन्यूफैक्चरिंग पर हावी हो चुका है। ऐसे में एक तो दीर्घकालिक निवेश की सीमा को घटाकर तीन-चार साल करना होगा। दूसरे, हीरा सदा के लिए जैसी धारणा से निकल हमेशा के लिए स्टॉक्स वाला फ्रेम तोड़ना होगा। निश्चिंतता नहीं, सतर्कता ज़रूरी है। अब तथास्तु में आज की कंपनी…

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