अर्थशास्त्रियों और आईएमएफ व विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के लिए देश का राजकोषीय घाटा, खासकर जीडीपी से उसका अनुपात बड़ा पवित्र मानक होता है। अपने यहां इसके ऊपर से एफआरबीएम एक्ट के तहत 31 मार्च 2021 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3% तक ले आना था। कोरोना महामारी के चलते यह लक्ष्य नहीं पूरा हो सका। अब सरकार ने इसे 2030 तक खिसका दिया है। इस बार 1 फरवरी को बजट पेश हुआ तो वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि 2025-26 में राजकोषीय़ घाटे को जीडीपी के 4.4% तक सीमित रखने का लक्ष्य पूरा हो गया है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यह कैसे-कैसे जुगाड़ से पूरा हुआ है। जीडीपी की नई सीरीज़ ने इस जुगाड़ का तिलिस्म भी तोड़ दिया है। बजट में पुरानी सीरीज़ में नॉमिनल जीडीपी का पूर्व अनुमान ₹357.14 लाख करोड़ का है, जबकि नई सीरीज में जीडीपी इससे 3.28% कम ₹345.47 लाख करोड़ ही निकला है। इस पर गणना करें तो ₹15.58 लाख करोड़ का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4% नहीं, बल्कि 4.5% निकलता है। सरकार इससे पहले के तीन सालों में भी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी है। यह 2022-23 में जीडीपी के 6.5% क बजाय 6.7%, 2023-24 में 5.5% के बजाय 5.7% और 2024-25 में 4.8% के बजाय 4.9% रहा है तो आगे कैसे पूरा होगा! अब बुधवार की बुद्धि…
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