अल्सटॉम के बहाने उतरते हैं मिथ में

बाजार में मिथ है कि एफआईआई जिस शेयर को खरीदते हैं, उसके भाव अपने-आप बढ़ जाते हैं। लेकिन सिर्फ यही कारक किसी शेयर को नहीं बढ़ा सकता। जैसे, मार्च 2011 के अंत तक अल्सटॉम प्रोजेक्ट्स इंडिया में एफआईआई की इक्विटी हिस्सेदारी 2.56 फीसदी थी, जबकि जून 2011 के अंत तक यह बढ़कर 4.10 फीसदी हो गई। जाहिर है कि एफआईआई की यह सारी खरीद 1 अप्रैल से 30 जून 2011 के बीच हुई होगी। लेकिन 1 अप्रैल को अल्सटॉम प्रोजेक्ट्स इंडिया बीएसई में 585.95 रुपए पर बंद हुआ था, जबकि 30 जून को इसका बंद भाव 513 रुपए रहा है। यानी, एफआईआई की खरीद बढ़ने के बावजूद अल्सटॉम का शेयर जून तिमाही में 12.45 फीसदी गिर गया।

तो क्या, इस गिरावट की वजह डीआईआई की बिकवाली हो सकती है क्योंकि मार्च तिमाही में जहां उनके पास एल्सटॉम की 13.02 फीसदी इक्विटी थी, वहीं जून तिमाही में यह घटकर 12.03 फीसदी रह गई। अल्सटॉम की कुल इक्विटी 67.02 करोड़ रुपए है जो दस रुपए अंकित मूल्य के 6,70,24,174 शेयरों में विभाजित है। जून तिमाही में जहां एफआईआई ने इसके 10,32,480 शेयर खरीदे, वहीं डीआईआई ने इसके 6,60,692 शेयर बेच डाले। इस तरह संस्थाओं की तरफ से एल्सटॉम के 3,71,788 शेयरों की शुद्ध खरीद हुई। फिर यह शेयर क्यों 12.45 फीसदी गिर गया?

असल में इस दौरान कॉरपोरेट निकायों ने कंपनी में अपना निवेश 4.59 फीसदी से घटाकर 3.68 फीसदी कर दिया। उन्होंने कंपनी के कुल 6,08,849 शेयर बेच डाले। इस तरह जून तिमाही में एल्सटॉम के 2,37,061 शेयर शुद्ध रूप से बेचे गए हैं तो इसका भाव गिरना ही था। अब देखते हैं कॉरपोरट निकाय के रूप में कंपनी में निवेश असल में है किसका? जून तिमाही के आंकड़ों के अनुसार कुल 1106 कॉरपोरेट निकायों के पास कंपनी के 24,69,469 शेयर हैं, जबकि मार्च 2011 की तिमाही में 968 कॉरपोरेट निकायों के पास कंपनी के 30,78,318 शेयर थे। इस तरह निकायों की संख्या बढ़ने के बावजूद इस श्रेणी के निवेशकों ने तीन महीनों में अपने 6,08,849 शेयर बेच डाले।

इस समय प्रवर्तकों के पास कंपनी के 66.48 फीसदी, डीआईआई व एफआईआई के पास 16.13 फीसदी और कॉरपोरेट निकायों के पास 3.68 फीसदी शेयर हैं। इसके बाद बचते हैं 13.71 फीसदी शेयर। इनमें से 10.77 फीसदी शेयर एक लाख रुपए से कम निवेश वाले 52,109 शेयरधारकों के पास, 0.63 फीसदी एक लाख से ज्यादा निवेश वाले 18 बड़े शेयरधारकों (एचएनआई) के पास और 2.31 फीसदी शेयर 817 अन्य शेयरधारकों के पास हैं।

मार्च 2011 की तिमाही में भी प्रवर्तकों के पास इतने ही शेयर थे। डीआईआई व एफआईआई के पास 15.58 फीसदी और कॉरपोरेट निकायों के पास 4.59 फीसदी शेयर थे। बाकी बचे 13.35 फीसदी शेयरों में से 10.27 फीसदी शेयर एक लाख रुपए से कम निवेश वाले 50,250 शेयरधारकों के पास, 0.80 फीसदी एक लाख से ज्यादा निवेश वाले 17 बड़े शेयरधारकों (एचएनआई) के पास और 2.29 फीसदी शेयर 822 अन्य शेयरधारकों के पास थे।

इस तरह हम देख सकते हैं कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 की पहली तिमाही के दौरान अल्सटॉम प्रोजेक्ट्स में जहां घरेलू निवेश संस्थाओं (डीआईआई), कॉरपोरेट निकाय व एचएनआई ने अपना निवेश घटाया है, वहीं एफआईआई व रिटेल निवेशकों ने इसे खरीदा है। हमने ऊपर देखा था कि संस्थाओं व कॉरपोरेट निकायों की तरफ से एल्सटॉम के शुद्ध रूप से बेचे गए शेयरों की संख्या 2,37,061 है। आइए देखते हैं कि रिटेल निवेशकों ने इस दौरान कंपनी के कितने शेयर खरीदे? एक तो इस दौरान कंपनी से 1859 नए रिटेल निवेशक जुड़ गए और दूसरे, सारे रिटेल निवेशकों के पास कुल शेयरों की मात्रा में 3,34,807 का इजाफा हो गया।

संस्थाओं व कॉरपोरेट निकायों की शुद्ध बिक्री के ऊपर 97,746 शेयर उन्होंने मुख्य रूप से एचएनआई से खरीदे हैं। ध्यान दें कि पहली तिमाही में एचएनआई ने अपने 1,10,134 शेयर बेचे हैं। मार्च 2011 में उनके पास कंपनी के 5,33,343 शेयर थे, जबकि जून 2011 में उनके शेयरों की संख्या 4,23,209 है।

यही है मोटे तौर पर वे श्रेणियां जो शेयरों में खरीद-बिक्री से उसके भाव उठाती गिराती रहती हैं। इसमें प्रवर्तकों से अलग उनसे जुड़े लोगों की श्रेणी कॉरपोरेट निकायों या अन्य के बेनामी नाम से सक्रिय रहती है। लेकिन जितने शेयर बेचे जाते हैं, उतने ही किसी न किसी के द्वारा खरीदे भी जाते हैं। कंपनी स्मॉल कैप या मिड कैप हो, यानी उसके शेयरों की मात्रा कम हो तो एक बार में लाखों शेयर का सौदा करनेवाली विदेशी निवेश संस्थाओं (एफआईआई) या फंडों की हरकत से उसके भाव अपने-आप ही हिल जाते हैं।

लेकिन अल्सटॉम जैसी 67.02 करोड़ रुपए की पूंजी और 3757 करोड़ रुपए के बाजार पूंजीकरण वाली कंपनी के शेयर पर केवल इससे खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन निवेश का पैटर्न किसी भी स्टॉक के भाव के लिए बहुत ही संवेदनशील जानकारी है जो कंपनियों को हर तिमाही अनिवार्य रूप से पेश करनी होती है। यह एक्सचेंजों की वेबसाइट पर आसानी से मिल जाती है। इसलिए हमें किसी शेयर में निवेश करने से पहले उसके बदलते निवेश पैटर्न पर जरूर एक बार गौर कर लेना चाहिए।

हां, एक बात और। इधर लगता है कि बीएसई के सिस्टम में कोई लोचा चल रहा है। कल बीएसई में अल्सटॉम (कोड – 532309) पिछले बंद भाव 560.30 रुपए से 12.55 फीसदी गिरकर 490 रुपए पर खुला जो उसका 52 हफ्ते का नया न्यूनतम स्तर बन गया। लेकिन वही शेयर यहां से 17.31 फीसदी बढ़कर 574.80 रुपए तक पहुंच गया। हालांकि बंद हुआ पिछले बंद स्तर से मात्र 0.04 फीसदी बढ़कर 560.55 रुपए पर। वहीं एनएसई में यह (कोड – APIL) 550 रुपए पर खुलकर 574.85 तक ऊपर और 537.65 तक नीचे जाने के बाद 0.09 फीसदी की बढ़त लेकर 560.15 रुपए पर बंद हुआ है। ऐसे में बीएसई में इस शेयर में चली भयंकर चपलता या वोलैटिलिटी पर एक्सचेंज को जरूर गौर करना चाहिए।

कल बीएसई में अल्सटॉम के 2.84 लाख शेयरों के सौदे हुए, जिसमें से 20.57 फीसदी डिलीवरी के लिए थे। वहीं एनएसई में ट्रेड हुए इसके 9.67 लाख शेयरों में से 19.08 फीसदी डिलीवरी के लिए थे। यहां एक बात गांठ बांध लें कि अगर किसी स्टॉक में डिलीवरी वाले सौदों का अनुपात बढ़ रहा हो या ज्यादा हो तो इससे पता चलता है कि निवेशकों को उसके भाव बढ़ने की उम्मीद है। और, आप जानते ही हैं, ये संसार ही नहीं, शेयर बाजार भी उम्मीद पर चलता है।

अंत में अल्सटॉम के बारे में इतना ही कि वह इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी मूलतः यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनी है। इतनी यूरोपीय कि भारत से मिली आय व ऑर्डर तक को यूरो में भी व्यक्त करती है। बाकी जानकारी आप उसकी साइट से हासिल कर सकते हैं। इसका नाम जल्दी ही एल्सटॉम प्रोजेक्ट्स इंडिया से बदलकर एल्सटॉम इंडिया कर दिया जाएगा। कंपनी यूं तो मूलतः काफी मजबूत है और लंबे निवेश के लिए सुरक्षित है। लेकिन अभी उसका शेयर 26.14 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है जो खुद उसके पिछले पैटर्न की तुलना में महंगा है। हां, अगर वह सचमुच गिरकर 490 रुपए पर आ जाए तो इसमें जरूर खरीद बनती है क्योंकि वह पिछले साल 7 अक्टूबर 2010 को ऊपर में 874.85 रुपए तक जा चुका है।

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