बैंक वित्तीय बाज़ार की पहली कड़ी हैं। लोगों को बचत की सुविधा और थोड़ा ब्याज देना। फिर वो बचत उद्योग व ज़रूरतमंद लोगों को ज्यादा ब्याज पर देकर कमाना। लेकिन बैंक आज इस सरल धंधे से बहुत आगे निकल चुके हैं। निवेश बैंकिंग उनका बड़ा धंधा बन चुका है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बैंकों के ट्रेजरी विभाग में काम करनेवालों की तनख्वाह औरों से तीन गुना तक ज्यादा होती है। अब पकड़ते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

जब भी हम किसी माध्यम से कमाने की सोचते हैं तो उसका मूल हमें पता होना चाहिए। अन्यथा, हम छायाओं से ही खेलते रह जाएंगे। हम सभी वित्तीय बाज़ार, खासकर शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं। आज वित्तीय बाज़ार में बिचौलियों की न जाने कितनी परतें घुस गई हैं। लेकिन मूलतः इसका मकसद था कि बचत करनेवाले को उसका उपयोग करनेवालों से ऐसे जोड़ा जाए कि दोनों का फायदा हो। अब देखें सोम का व्योम…औरऔर भी

उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है। स्टार्ट-अप वाले भी जुगाड़ टाइप रिस्क ही लेते हैं। आईआईएम या आईएमएम वाले सुरक्षित रिस्क लेते हैं। समझने की बात है कि ट्रेडर न तो उद्यमी है, न ही स्टार्ट-अप या फाइनेंस का मास्टर। उसका ट्रेड ऐसा है जिसमें बाज़ी बड़े बारीक अंतर से इधर से उधर चली जाती है। इसलिए उसे हिसाब लगाना पड़ता है कि इतना हारे, उतना जीते तो फायदे के लिए सौदे में रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कितना होनाऔरऔर भी

ट्रेडरों का रिस्क प्रोफाइल भिन्न होता है तो उनकी ट्रेडिंग रणनीति भी अलग होती है। जो लोग कम रिस्क लेना चाहते हैं उन्हें तिमाही नतीजों की घोषणा के आसपास कंपनी के शेयरों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। नतीजों के 15-20 दिन बाद जब मारकाट मिट जाए, मामला शांत हो जाए, तभी उसकी तरफ झांकना चाहिए। वैसे, कुछ भी कर लो ट्रेडिंग से रिस्क खत्म नहीं हो सकता। इसलिए हिसाब से चलें। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

हर खेल हर खिलाड़ी के लिए नहीं होता। वहीं, हर बॉल पीटने के चक्कर में बल्लेबाज़ खुद पिट जाता है। लंबी पारी खेलने में माहिर धुरंधर बहुत-सी गेंदों को जाने देते हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में भी अगर आपको लंबी पारी खेलनी है, बराबर कमाना है तो बहुत सारे अवसरों पर आपको ट्रेडिंग से दूर रहना चाहिए। मसलन, आज डेरिवेटिव सौदों की एक्सपायरी के दिन बाज़ार से दूर रहने में भलाई है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

दोस्तों! आज गुरुनानक जयंती के अवसर पर बाज़ार बंद है तो सोचा, क्यों न ट्रेडिंग के चिंतन व कर्म से जुड़ी कुछ मूलभूत बातों को दोहरा लिया जाए। वैसे, आपने गौर किया होगा कि हर सप्ताह इस कॉलम के लेखों का पहला पैरा एक ही थीम को आगे बढ़ाता है। इसे पढ़ने के लिए किसी सब्सक्रिप्शन की ज़रूरत नहीं। हमारा लक्ष्य है कि वित्तीय बाज़ार में दिलचस्पी रखनेवाले सामान्य पाठक भी ट्रेडिंग की मूल बातों से परिचितऔरऔर भी

आईआईटी या आईआईएम से निकलने वाले बहुत से विद्यार्थी धनार्थी बनने के चक्कर में स्टार्ट-अप की तरफ भाग रहे हैं। लेकिन सही मायनों में वे उद्यमी नहीं है क्योंकि उद्यमी वो शख्स होता है जो सुरक्षा की परवाह किए बगैर नए धंधे में उतर जाता है। जो बच्चे आईआईटी या आईआईएम में जाते हैं वे तो परम सुरक्षा की खातिर ये डिग्रियां पाने जाते हैं। महज धन के पीछे भागनेवाला उद्यमी नहीं होता। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

आजकल लोगों को नौकरी कम जमती है। स्टार्ट-अप बन चुके हैं और बनते ही जा रहे हैं। उद्यमियों की भी भरमार है। सभी आर्थिक आज़ादी चाहते हैं। वित्तीय बाज़ार में भी लोगबाग यही आज़ादी हासिल करने के लिए आते हैं। सभी रिस्क लेते हैं। लेकिन स्टार्ट-अप, उद्यमी, निवेशक या ट्रेडर के रिस्क लेने का स्तर भिन्न होता है। उद्यमी रिस्क ही रिस्क लेता है, जबकि ट्रेडर हिसाब से रिस्क लेता है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी