हल्ला ऐसा उठा है मानो अमेरिका में ब्याज दर बढ़ते ही सारा कुछ बरबाद हो जाएगा। लेकिन इसके कई फायदे भी हैं। इससे अमेरिका के जो बुजुर्ग अपनी बचत पर मिली ब्याज पर निर्भर हैं, उनकी आय बढ़ जाएगी। इसके बाद अमेरिका में मुद्रास्फीति बढ़कर 2% हो सकती है जिससे डॉलर की विनिमय दर बढ़ेगी और वहां आयातित चीजों के दाम घट जाएंगे। इससे शेयर बाज़ार का बुलबुला भी संभलने लगेगा। अब परखते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

यह हफ्ता भारत ही नहीं, दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों के लिए ऐतिहासिक होने जा रहा है। भारत में बुध-गुरु की रात और अमेरिका में बुधवार का दिन वो खबर लेकर आएगा जिस पर सारी दुनिया की निगाहें टिकी हुई है। 70-75% प्रायिकता इस बात की है कि उस दिन फेडरल रिजर्व लगभग एक दशक से ठहरी ब्याज दरों को बढ़ा देगा और यह दर 0.25% से बढ़ाकर 0.50% की जा सकती है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

बिना लागत के कोई बिजनेस नहीं होता। ऐसे में ट्रेडिंग भी अगर बिजनेस है तो उसकी लागत क्या है? आपकी मेहनत, ब्रोकर की ब्रोकरेज, टैक्स और आपकी ट्रेडिंग पूंजी पर आमतौर पर मिल सकनेवाला ब्याज़। काश! अगर वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग की इतनी ही लागत होती तो वो बहुत मुनाफे का धंधा होता। लेकिन हकीकत में इसमें जो स्टॉप लॉस लगता है, वो इस धंधे की असली लागत है। इससे बचना संभव नहीं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

कभी भी किसी के कहने में न आएं। ब्रोकरों व टेलिविज़न चैनलों पर आनेवाले एनालिस्टों पर कतई भरोसा न करें। वे सब अपना-अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे हैं। हो सकता है कि यदाकदा उनकी किसी बात से आपका फायदा हो जाए। लेकिन यह अपवाद है, नियम नहीं। आपका भला करना उनके बिजनेस मॉडल का हिस्सा नहीं है। न्यूज़ हो तो किनारे हो लें। भावों का चार्ट ही आपका इकलौता भरोसेमंद सहारा है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

इधर टिप्स देनेवालों के साथ ही धंधेबाज़ों की एक नई जमात पैदा हो गई है जो आपको ‘फाइनेंशियल फ्रीडम’ दिलाने का दावा करते हैं। क्लासेज़ चलाते हैं। 25-30 हज़ार से लेकर लाख-डेढ़ लाख तक फीस लेते हैं। ये चार्ट, वो चार्ट। तरह-तरह की एनालिसिस। बाबाओं के अंदाज़ में चमत्कार और गुरु-चेले की फांस। लेकिन उनकी बातों का सार बस इतना है कि ट्रेडिंग भी थोक में खरीदकर रिटेल में बेचने का व्यापार है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

भीड़भाड़ वाली सड़क पर अगर पांच सौ का नोट गिरा पड़ा हो तो सावधान हो जाइए क्योंकि हो सकता है कि कुछ लोग आपको छकाने की मस्ती कर रहे हों। इसी तरह ट्रेडिंग में आसानी से नोट नहीं बनते। देशी-विदेशी दिग्गज यहां मैदान में डटे हैं। उनके बीच उतरकर नोट कमाना शेर के जबड़े से शिकार खींचने जैसी बहादुरी है। लेकिन ट्रेडिंग में बहादुरी नहीं, समझदारी चलती है जो अभ्यास से आती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग चुटकी बजाकर अमीर बनाने का धंधा नहीं है। यहां सरकारी बांडों या बैंकों की एफडी जैसी सुरक्षा नहीं है। यहां तो दीर्घकालिक निवेश जैसी निश्चिंतता भी नहीं है। यह एक तरह का बिजनेस है। टैक्स के लिहाज से भी इसे बिजनेस ही माना गया है और इससे हुई आय पर उसी हिसाब से टैक्स लगता है। शेयरों की ट्रेडिंग में उतरनेवालों को यह बुनियादी बात हमेशा याद रखनी चाहिए। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अमेरिका ही नहीं, यूरोप व जापान तक में नोट छापकर बाज़ार में डालने का सिलसिला चला हुआ है। ब्याज दर लगभग शून्य है। ऐसे उधार पर 2-4% सालाना रिटर्न भी मिल जाए तो निवेशकों की मौज। इसी बेहद सस्ते धन के दम पर दुनिया भर के बाज़ार चढ़े हुए हैं। सालोंसाल से अमेरिकी कंपनियों का धंधा और मुनाफा ठहरा हुआ है। फिर भी डाउ जोन्स सूचकांक ऐतिहासिक चोटी तक चला गया। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

शेयर बाज़ार का मकसद बड़ा सीधा-सरल है। वो लोगों की उस पूंजी को खींचने का माध्यम है जिसे उद्योग-धंधों में लगाने का रिस्क लिया जा सकता है। लेकिन आज लोगों को इसमें कोई उद्योग नहीं, बल्कि नोट कमाने का धंधा भर दिखता है। यह लालच व डर की भावना का भुनाने का ज़रिया बन गया है। शेयरों के भाव कंपनी की ताकत पर नहीं, बल्कि सस्ते धन के आगम पर चढ़े हुए हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ऋण देना समझ में आता है। लेकिन ऋण भी बिकने लग जाए तो माथा घूम जाता है। बैंक जो ऋण वसूल नहीं पाते, उसे दूसरे के माथे मढ़ देते हैं। उसे लेनेवाला इसे बोझ नहीं, बल्कि धंधा समझता है। तमाम एसेट रीक्रंस्ट्रक्शन कंपनियां बन चुकी हैं। सीडीओ, सीडीएस जैसे न जाने कितने प्रपत्र बन चुके हैं। यह अलग बात है कि इन्हीं के चक्कर में 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी