इस कॉलम के दो-तिहाई हिस्से में बताया जाता है कि ठीक पिछले दिन निफ्टी का क्या हाल रहा, शेयर बाज़ार में घबराहट का सूचकांक क्या कहता है, संस्थाओं की खरीद, अमेरिका व यूरोप में बाजार का बंद स्तर और आज एशिया व ऑस्ट्रेलिया में शुरुआती रुख। फिर निफ्टी की संभावित दिशा के साथ तीन शेयर अभ्यास के लिए। हर दिन इतना बताने का मसकद है आपको खुद निर्णय लेने के लिए प्रेरित करना। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग प्रायिकता का खेल है। जिसको भी यहां से कमाना है, उसे यह बात भलीभांति अपने जेहन में बैठा लेनी चाहिए। दूसरे, यहां काफी अहम रोल इंसान का मन निभाता है। जो धन नहीं लगा रहा और जो लगा रहा है, दोनों का मनोवैज्ञानिक रिस्पांस अलग-अलग होता है। इसलिए कोई भी सलाह तब तक आपके किसी काम की नहीं होती, जब तक आप उसे अपनी कसौटी पर नहीं कस लेते। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल सिस्टम से 42,000 करोड़ डॉलर खींचने जा रहा है, जबकि अगले साल 60,000 करोड़ डॉलर निकालने की योजना है। सिस्टम से धन निकालने से वहां ब्याज़ दरें बढ़ने लगी हैं। दस साल के अमेरिकी ट्रेजरी बांडों पर यील्ड की दर 2.95% हो चुकी है। जाहिर है कि जब विदेशी निवेशकों को सस्ता धन मिलना मुश्किल और अमेरिका में ही ज्यादा रिटर्न मिलने लगेगा, तो वे भारत क्यों आएंगे! अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से 5 फरवरी से कल, 21 फरवरी तक 14,069.78 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। यह उनकी मजबूरी है। दरअसल, 2008 के वित्तीय संकट के बाद अमेरिका समेत दुनिया के तमाम केंद्रीय बैंकों ने बांडों के जरिए सिस्टम में भारी भरकम रकम डाली। 2009 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैलेंसशीट 50,000 करोड़ डॉलर थी जो अब 4.2 लाख करोड़ डॉलर की हो गई है। वो इसे घटा रहा है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

कोई भी संस्था या अमीर शेयर बाज़ार में हमेशा के लिए निवेश नहीं करते। उनका मकसद है लाभ कमाना। इस बार बजट के बाद यही सिलसिला जारी है। वे रुक-रुककर मुनाफावसूली कर रहे हैं। पहले सेंसेक्स और निफ्टी ही गिर रहे थे। लेकिन अब मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों के शेयरों में भी बिकवाली शुरू हो गई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के साथ ही अब देशी संस्थाएं भी खरीदने से ज्यादा बेचने लगी हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जिन 1% सुपररिच या एचएनआई भारतीयों ने 2017 में 73% दौलत हासिल की, वे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों के जरिए या सीधे निवेश करते हैं। बाज़ार में एलआईसी जैसी संस्थाएं भी जमकर पैसा लगाती हैं। उसने दिसंबर 2017 की तिमाही तक जिन 327 लिस्टेड कंपनियों में 1% से ज्यादा शेयर खरीद रखे हैं, उनमें उसका निवेश 6.26 लाख करोड़ रुपए है। ऐसी संस्थाएं और एचएनआई ही बाज़ार का रुख तय करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

अमीर अपना इफरात धन शेयर बाज़ार में लगाते हैं। उनकी दौलत बढ़े तो बाज़ार में ज्यादा धन आता है। बीते साल 2017 में भारत में 1% अमीरों के हाथ 73% दौलत आ गई तो उनका धन बाज़ार में उमड़ पड़ा। पर लिस्टेड कंपनियों और उनके शेयरों की संख्या सीमित है। नतीजतन, ज्यादा धन बाज़ार को उठाता गया और हाल-फिलहाल गिरने के बावजूद इतना नहीं गिरा है कि आमलोगों की पकड़ में आ जाए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

बजट से कल तक सेंसेक्स 4.48% गिर चुका है और वो 24.45 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। लेकिन इसी दौरान स्मॉलकैप सूचकांक 2.45% और मिडकैप सूचकांक 2.71% ही गिरा है, जबकि ये क्रमशः 106.74 और 39.90 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहे हैं। जाहिर है कि आसमान पर चढ़े स्मॉलकैप और मिडकैप कंपनियों के शेयर नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहे। मगर, देर-सबेर इनका गिरना तय है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारा शेयर बाज़ार मूल्यांकन के खतरनाक ज़ोन के काफी करीब है। इसे बाज़ार पूंजीकरण और जीडीपी के अनुपात से समझा जा सकता है। बीएसई का बाज़ार पूंजीकरण कल 1.49 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि बजट में बाज़ार मूल्य पर जीडीपी का संशोधित अनुमान 1.67 लाख करोड़ रुपए का है। इस तरह दोनों का अनुपात 89.22% बनता है। यह अनुपात 2008 में जब 100% के पार चला गया था तो सेंसेक्स 38% टूटा था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट के बाद से हमारा शेयर बाज़ार जिस तरह रह-रहकर हिचकोले खा रहा है, वह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा? क्या वह आगे और ज्यादा नहीं गिर सकता या भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित ताकत उसे चढ़ाती जाएगी? इन सवालों का जवाब फौरन नहीं दिया जा सकता। उधर, साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद विश्व बाज़ार में छोड़ी गई सस्ती पूंजी वापस खींची जा रही है। सस्ते धन का स्रोत सूख रहा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी