अमेरिका में सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) के बंद होने से उपजे संकट से भारत के सैकड़ों स्टार्ट-अप उद्यमी बाल-बाल बच गए। एसवीबी में मनी ट्रांसफर की स्विफ्ट सुविधा न होने के बावजूद उन्होंने अपनी जमापूंजी अमेरिका के दूसरे बैंकों में ट्रांसफर कर दी। साथ ही उन्हें भारत सरकार, रिजर्व बैंक और गिफ्टी सिटी के अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नेटवर्क से भी मदद मिली। लेकिन कुल मिलाकर भारत में स्टार्ट-अप्स की मौजूदा स्थिति क्या है? इसे हमें भारतीय अर्थव्यवस्था कीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हो या वित्तीय बाज़ार का कोई भी निवेश, वो किसी निर्वात में नहीं होता। हर निवेश का एक संदर्भ और माहौल होता है। इधर साल भर पहले मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका से ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला जब से शुरू हुआ, तब से सारी दुनिया के वित्तीय समीकरण बदल गए हैं। अमेरिका में तो ब्याज दरों के शून्य से 5% पहुंचने का ही नतीजा है कि बैंकों के सारे बॉन्ड पोर्टफोलियो कीऔरऔर भी

अमेरिका के सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) का संकट अभी तक पूरी तरह मिटा नहीं है। वैसे, वहां के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने अलग से 25 अरब डॉलर का बैंक टर्म फंडिंग प्रोग्राम (बीटीएफपी) बना दिया है। हर संकट से निपटने की पूरी तैयारी है। लेकिन बीते शुक्रवार को बैंक बंद हुआ तो भारतीय स्टार्ट-अप उद्यमों में अफरातफरी मच गई। कारण, चूंकि एसवीबी इन्हें बिना किसी अमेरिकी सोशल सिक्यूरिटी नंबर या इनकम टैक्स आइडेंटीफिकेशन नंबर के खातेऔरऔर भी

पहले फेडरल रिजर्व की चेयरमैन भी रह चुकी अमेरिका की वित्त मंत्री जैनेट येलेन ने साफ कर दिया कि सरकार करदाताओं के धन से सिलिकॉन वैली बैंक का बेलआउट नहीं करेगी क्योंकि वह व्यवस्थागत रूप से महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन सरकार की तरफ से बैंकों को संकट से उबारने और जमाकर्ताओं को बचाने के पूरे इंतज़ाम किए ही जा रहे थे कि छह और बैंकों पर खतरे की घंटियां बजने लगी है। इनमें क्रेडिट सुइस जैसा बैंकऔरऔर भी

कितनी विचित्र बात है कि दुनिया की सबसे बड़ी व विकसित अर्थव्यवस्था अमेरिका तक में किसी बैंक के डूबने पर सारे जमाकर्तोओं का सारा धन उन्हें फौरन वापस नहीं मिलता। मसलन, अमेरिका के 16वें सबसे बड़े बैंक – सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) की महज 11% जमा का ही बीमा सरकारी एजेंसी फेडरल डिपॉज़िट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (एफडीआईसी) ने कर रखा है। जमाकर्ताओं का बाकी धन तब मिलेगा, जब कोई दूसरा बैंक एसवीबी का अधिग्रहण करेगा। फिलहाल अमेरिका कीऔरऔर भी

अमेरिका का 175 अरब डॉलर डिपॉज़िट वाला सिलिकॉन वैली बैंक डूबा क्यों? मालूम हो कि यह अमेरिका का 16वां सबसे बड़ा बैंक था और इसके पास दिसंबर 2022 के अंत में कु 209 अरब डॉलर की आस्तियां थी। लेकिन इसने जब निकलती जमा की भरपाई के लिए अमेरिकी सरकार के ट्रेजरी बॉन्ड बेचने की कोशिश की तो उसे एक झटके में 1.8 अरब डॉलर की चपत लग गई। असल में बैंक अपनी बचत सुरक्षित रखने के लिएऔरऔर भी

दुनिया के आर्थिक व वित्तीय पटल पर इस समय भयंकर अनिश्चितता छाई हुई है। कब कहां से अचानक कोई आफत टपक पड़े, कहा नहीं जा सकता। इसकी शुरुआत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था व वित्तीय केंद्र अमेरिका से होती है। ताजा मामला यह है कि अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी टेक्नोलॉज़ी कपनियों को ऋण देनेवाला सिलिकॉन वैली बैंक संकट के बाद शुक्रवार को बंद हो गया। यह साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बैठने वालाऔरऔर भी

किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उसकी परख और कामकाज का विश्लेषण ज़रूरी है। दिक्कत यह है कि यह ज़रूरी काम कायदे से कैसे किया जाए? कंपनी के अतीत का विश्लेषण हम कर सकते हैं। उसके अब तक के वित्तीय प्रदर्शन की तहकीकात कर सकते हैं। उद्योग व बाज़ार की तुलना में उसके शेयर का मूल्यांकन कर सकते हैं। ये पहलू मात्रात्मक विश्लेषण से साफ हो जाते हैं। इनमें कंपनी पर चढ़े ऋण से जुड़ाऔरऔर भी

माना जाता है कि इक्विटी एफ एंड ओ सेगमेंट में फ्यूचर्स ही सबसे ज्यादा रिस्की है, जबकि ऑप्शंस में ट्रेड करना अपेक्षाकृत सुरक्षित है क्योंकि इसमें नुकसान सीमित है और उतना ही धन डूबता है जितना ऑप्शंस के लिए आपने प्रीमियम दिया होता है। लेकिन सेबी की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक ऑप्शंस भी ज्यादातर व्यक्तिगत ट्रेडरों के लिए घाटे का सौदा हैं। रिपोर्ट बताती है, “वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान इंडेक्स ऑप्शंस में ट्रेड करनेवाले 89% व्यक्तियोंऔरऔर भी

सेबी की अध्ययन रिपोर्ट में लिखा गया है, “इक्विटी एफ एंड ओ सेगमेंट में 89% व्यक्तिगत ट्रेडरों को वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान औसतन 1.1 लाख रुपए का नुकसान हुआ, जबकि 90% सक्रिय ट्रेडरों का औसत नुकसान इसी अवधि में 1.25 लाख रुपए का दर्ज किया गया। सक्रिय ट्रेडरों के पूरे समूह की बात करें तो उनके शुद्ध ट्रेडिंग नुकसान का औसत इस दौरान 50,000 रुपए का रहा।” बता दें कि व्यक्तिगत निवेशकों या ट्रेडरों की श्रेणीऔरऔर भी