बजट से उद्योगों से लेकर आम लोगों और शेयर बाज़ार तक को बड़ी उम्मीदें हैं। सबको रियायत या टैक्स में छूट की आस। हालांकि समस्याएं विकट हैं। मैन्यूफैक्चरिंग पस्त है। जीडीपी में जो 12-14% मैन्यूफैक्चरिंग है, उसका बड़ा हिस्सा चीन को आउटसोर्स कर दिया गया है। फिर भी बजट में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ाने का शोर तो होगा ही। लेकिन हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार का जिक्र तक करना वित्त मंत्री उचित नहीं समझेंगी। उनके लिए तो हरऔरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों में एसआईपी के नियमित प्रवाह से देशी वित्तीय संस्थाओ का दम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन इसकी दशा-दिशा तय करने में अब भी विदेशी पूंजी का अहम रोल है। इस विदेशी पूंजी का प्रोफाइल साल 2017 में भारत-मॉरीशस टैक्स संधि में संशोधन और सेबी के कड़े नियमों के बाद काफी बदल गया है। 2015 तक भारत में आ रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) में मॉरीशस के पते वाली फर्मों काऔरऔर भी

मोदी सरकार एक डरी हुई सरकार है। यह येनकेन प्रकारेण ऊपर से लेकर नीचे तक सत्ता के समूचे तंत्र पर कब्जा करना चाहती है। इसलिए नहीं कि इसे देश का विकास करना है, बल्कि इसलिए कि इसे अपने यारों का भला और जनधन की अबाध लूट से अपनी पार्टी व संघी तंत्र का खजाना भरते रहना है। हर खास-ओ-आम को फिर भी उम्मीद है कि सरकार बजट में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और उपभोक्ता मांग बढ़ाने केऔरऔर भी

भारत का ऋण-जीडीपी अनुपात अपने-आप में ज्यादा नहीं कहा जा सकता। ब्रिक्स के मूल पांच देशों में रूस (24.8%) व दक्षिण अफ्रीका (79.5%) को छोड़ दें तो ब्राज़ील (95%) और चीन (102.3%) का ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे ज्यादा है। विकसित देशों में अमेरिका का यह अनुपात 128.7%, ब्रिटेन का 104.8%, फ्रांस का 119.6% और जापान का 226.8% है, जबकि जर्मनी का यह अनुपात 66% है। पाकिस्तान का तो ऋण-जीडीपी अनुपात हमसे कम 71.3% है। असल दिक्कत यह हैऔरऔर भी

नए साल के बजट की बेला आ चुकी है। ऐसे में जानना ज़रूरी है कि ऊपर-ऊपर भले ही देश पहली तिमाही में जीडीपी 7.8%, दूसरी तिमाही में 8.2% और पूरे वित्त वर्ष में 7.4% की विकास दर के साथ उछलता दिख रहा हो, लेकिन सतह के नीचे तैरती और बढ़ती पस्ती गहराने लगी है। इसका सबसे बड़ा आभास देश में सरकारी ऋण और जीडीपी के बढ़ते अनुपात से मिलता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहती रही हैंऔरऔर भी

इस समय दुनिया में भारत की स्थिति गांव में गरीब की लुगाई जैसी हो गई है जिसे हर कोई मजे में छेड़कर चला जाता है। ट्रम्प ने पहले 25% के ऊपर 25% और टैरिफ लगाकर अपनी शर्तें मनवा ली। अब 25% अतिरिक्त टैरिफ हट भी गया तो अमेरिका 25% तो लगाएगा ही। यूरोपीय संघ दूसरे तरीके से मजे ले रहा है। एक तरफ यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेर लायन कहती हैं कि यूरोपीय संघ भारतऔरऔर भी

आज के हालात में भारत में कमाना बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए भी मुश्किल हो गया है। दिसंबर तिमाही के ताज़ा वित्तीय नतीजे पस्ती की हालत का दस्तावेज़ बन गए हैं। जिन आईटी कंपनियों का दायरा विदेश तक फैला हुआ है, उन तक के नतीजे उम्मीद से खराब रहे हैं। इनमें टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआई माइंडट्री शामिल हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और आईसीआईसीआई बैंक तक ने निराश किया है। रिलायंस रिटेल का धंधा दबनेऔरऔर भी

चीन पर बढ़ती निर्भरता सुनियोजित लगती है। नवंबर 2016 में नोटबंदी से हमारे एमएसएमई क्षेत्र की कमर तोड़ दी गई। जुलाई 2017 में जीएसटी आया तो छोटी व मध्यम औद्योगिक इकाइयों पर दूसरा सरकारी हमला हुआ। फिर मार्च 2020 में कोरोना महामारी में गलत लॉकडाउन के फैसले ने हज़ारों लघु इकाइयों पर ताला लगवा दिया। यह सब करते हुए सरकार मगन थी कि वह अर्थव्यवस्था का इनफॉर्मल स्वरूप खत्म कर उसे फॉर्मल बना रही है, सारी औद्योगिकऔरऔर भी

भारत को अगर अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस व जापान जैसा विकसित देश बनना है या चीन, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका व इंडोनेशिया जैसा उच्च मध्यम आय का देश भी बनना है तो मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ाना होगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 साल पहले 2015 में कहा था कि 2025 तक जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 25% पर पहुंचा देंगे। हकीकत यह है कि यह 2011-12 में जीडीपी का 17.4% हुआ करता था। 2024-25 में घटते-घटते 13.9% परऔरऔर भी

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। पिछले दस सालों में देश का जीडीपी मार्च 2016 के ₹135.76 लाख करोड़ से 2.63 गुना होकर मार्च 2026 तक ₹357.14 करोड़ पर पहुंचने जा रहा है। जाहिर है कि देश की धन-दौलत भी बढ़ी है। लेकिन यह धन-दौलत जा कहां रही है? किसानों की आय तो दोगुना हुई नहीं! इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस सालों में मध्यम वर्ग की औसत कमाई ₹10.23 लाखऔरऔर भी