जो लोग भी आपको टिप्स बांटते हैं, चाहे वे ब्रोकर फर्में हों या तथाकथित स्वतंत्र एनालिस्ट, उनसे कभी पूछिए कि इनका आधार क्या है? अगर आधार घोषित/अघोषित खबर है तो यकीन मानिए कि गन्ने का सारा रस निचुड़ जाने के बाद अब खोइया ही बची है। अगर टेक्निकल एनालिसिस है तो वह गुजरे हुए पल के डाटा पर आधारित है। फिर, इसमें तो हज़ारों लोग माहिर हैं तो आप औरों से जीतोगे कैसे! सोचिए। बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

इधर कुछ दिन दिल्ली में हूं और भांति-भांति के लोगों से मिलना-जुलना चल रहा है। कल शाम फाइनेंस जगत के खास किरदार से मुलाकात हुई। उनका कहना था कि इस बाज़ार में हमारे-आप जैसे रिटेल/आम निवेशकों का कोई भविष्य नहीं। मैंने इधर-उधर की बातें कर उनके अहं का पूरा ख्याल रखा। लेकिन मन ही मन कहा कि अगर हमारा भविष्य नहीं है तो इस देश की अर्थव्यवस्था का भी कोई भविष्य नहीं है। अब बाज़ार की दशा-दिशा…औरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया घाघों से भरी है। शेयर बाज़ार में तो ऐसे लोगों की भरमार है जो मालिकों से जोड़तोड़ करके ऐसी कंपनियों के शेयर निवेशकों के गले मढ़ देते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं। इसलिए निवेश की दुनिया में बड़ी सावधानी से कदम बढ़ाएं। एक मोटी-सी सावधानी यह है कि अगर कंपनी के प्रवर्तकों ने अपने शेयर गिरवी रखे हों तो उसमें भूलकर भी निवेश न करें। तथास्तु में आज एक बेहद साफ-सुथरी और संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

बाज़ार ऐतिहासिक ऊंचाई बना चुका है। सेंसेक्स और निफ्टी चढ़ते ही जा रहे हैं। क्या भारतीय अर्थव्यस्था वाकई इतनी मजबूत होती जा रही है कि शेयर सूचकांकों का बढ़ना स्वाभाविक है? कोई भी बता सकता है कि ऐसा कतई नहीं है। बाज़ार बाहर से आ रहे सस्ते धन के दम पर फूल रहा है और जैसे ही अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व हर महीने सिस्टम में 85 अरब डॉलर डालने का सिलसिला रोक देगा, भारत समेतऔरऔर भी

हिजरी संवत का पहला महीना, मुहर्रम। इसका दसवां दिन यौमे-आशूरा कर्बला के शहीदों की यादगार में मनाया जाता है। पहले की गणना के हिसाब से यह दिन आज पड़ना था। लेकिन अब यह दिन 15 नवंबर को पड़ रहा है तो ताजिया के जुलूस आज नहीं, कल निकलेंगे। छुट्टी कल है, आज बाज़ार खुला है। वैसे, चंद सदियों में ज़माना कितना बदल गया। रेगिस्तानी मैदानों के युद्ध स्क्रीन तक सिमट गए हैं। अब हफ्ते की आखिरी ट्रेडिंग…औरऔर भी

डॉलर की फांस फिर चुभने लगी है। रुपया गिरने लगा है। लेकिन ज्यादा गिरने की उम्मीद नहीं है क्योंकि इस बार रिजर्व बैंक के पास सिस्टम में डालने के लिए पर्याप्त डॉलर हैं। इस बीच सितंबर में हमारा औद्योगिक उत्पादन 2% बढ़ा है, जबकि अगस्त में यह 0.4% ही बढ़ा था। यह ठीकठाक खबर है। पर अक्टूबर में उपभोक्ता मुद्रास्फीति का उम्मीद से ज्यादा 10.09% बढ़ना बुरी खबर है। क्या होगा इस खबरों का असर, बताएगा बाज़ार…औरऔर भी

फाइनेंस की दुनिया ज्यादा अस्थिर, ज्यादा रिस्की हो चली है। ग्लोबल हरकतें लोकल खबरें बन गई हैं। नेट व चौबीसों घंटे चलते न्यूज़ चैनलों ने सूचनाओं को सर्वसुलभ करा दिया। पर प्रोफेशनल फंड मैनेजर सूचनाओं के आम होने से पहले ही उनका खास इस्तेमाल कर लेते हैं। खबर हम तक पहुंचे, इससे पहले वे उसका रस निकाल लेते है। लेकिन सारी हरकतें जाती हैं भाव में। इसलिए भाव को पकड़ो, भाव पर खेलो। अब देखें बाज़ार मंगल का…औरऔर भी

पहले नौकरी। फिर जूस की दुकान। अब ट्रेडिंग का जुनून सवार है। सारी पोथियां बांच डालीं। चार्ट पर इतने सारे इंडीकेटर चिपकाए कि माथा झन्ना गया। अरे भाई! इतना उलझाव क्यों? जीवन में कठिनतम सवालों के जवाब बड़े आसान हुआ करते हैं। बाज़ार कैसे काम करता है, आगे क्या होनेवाला है, आप सही-सही कभी नहीं जान पाएंगे। ट्रेडिंग में कूदने से पहले इसे गांठ बांध लें। यह गारंटी नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब रुख सोमवार का…औरऔर भी

मशहूर विश्लेषक मार्क फेबर का मानना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय साल 2008 से भी बदतर अवस्था में है। जबरन कम रखी ब्याज दरों का विस्तार अमेरिका से लेकर यूरोप तक हो चुका है। हर महीने 85 अरब डॉलर के नोट झोंकने के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था संतोषजनक स्थिति में नहीं आ पाई है। भारत व चीन जैसे उभरते देश भी सुस्त पड़ते दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में ऐसी कंपनी, जिसका आधार बड़ा मजबूत है…औरऔर भी

हम ज़मीन को छोड़े बगैर आसमान में उड़ना चाहते हैं! कार चलाना आ गया तो मान बैठते हैं कि हवाई जहाज़ भी उड़ा लेंगे। सोने व रीयल एस्टेट को जान लिया तो सोचते हैं कि शेयर बाज़ार और फॉरेक्स बाज़ार पर भी सिक्का जमा लेगे। यह संभव नहीं है क्योंकि भौतिक अर्थव्यवस्था और फाइनेंस की अर्थव्यवस्था में सचमुच ज़मीन आसमान का अंतर है। डिमांड, सप्लाई और दाम का रिश्ता यहां भी है और वहां भी। लेकिन समीकरणऔरऔर भी