रिश्ते तो वही, पर समीकरण भिन्न हैं

हम ज़मीन को छोड़े बगैर आसमान में उड़ना चाहते हैं! कार चलाना आ गया तो मान बैठते हैं कि हवाई जहाज़ भी उड़ा लेंगे। सोने व रीयल एस्टेट को जान लिया तो सोचते हैं कि शेयर बाज़ार और फॉरेक्स बाज़ार पर भी सिक्का जमा लेगे। यह संभव नहीं है क्योंकि भौतिक अर्थव्यवस्था और फाइनेंस की अर्थव्यवस्था में सचमुच ज़मीन आसमान का अंतर है। डिमांड, सप्लाई और दाम का रिश्ता यहां भी है और वहां भी। लेकिन समीकरण बिलकुल अलग हैं।

जैसे, भौतिक या असल अर्थव्यवस्था में दाम या मूल्य बढ़ते हैं तो उसकी मांग घट जाती है। प्याज के दाम ज्यादा हुए तो लोग उसकी खपत घटा देते हैं। प्याज की मांग इस तरह धीरे-धीरे घटने लगती है जिसका असर बाद में दाम के गिरने में देखने को मिलता है। लेकिन फाइनेंस की दुनिया में इसका उल्टा होता है। किसी स्टॉक के भाव बढ़ने लगे तो उसकी मांग बढ़ जाती है। हर कोई उसे खरीदने के चक्कर में पड़ जाता है। इस दबाव में उसके भाव कम से कम कुछ समय के लिए और ज्यादा चढ़ जाते हैं। हर्षद मेहता जैसे खिलाड़ी इसी समीकरण और सोच से करोड़ों बनाते रहे हैं।

दाम गिर जाए तब भी असल और फाइनेंस की दुनिया में आदतन हम विपरीत व्यवहार करते हैं। मान लीजिए कि आप मन बनाकर गए कि आपको 32 इंच का एलईडी टीवी खरीदना है। दुकान में पहुंचे तो पता चला कि उसी एलईडी टीवी पर 50% डिस्काउंट का खास ऑफर चल रहा है। दुकानदार कहता है कि इस ऑफर में बस पांच टीवी और बचे हैं। आप लपककर जाकर खरीद लेते हैं। यही नहीं, फौरन बाद घर-परिवार और मित्रों के साथ इस जबरदस्त खरीद की खुशी भी बांटते हैं।

वहीं मान लीजिए कि आपको किसी कंपनी का शेयर खरीदना था। आपने देखा-परखा और सोचा कि इसे 400 के भाव पर खरीदा जा सकता है। दो दिन बाद आपने नेट पर चेक किया या ब्रोकर से पता किया तो मालूम हुआ कि वह शेयर कुछ नकारात्मक खबरों के चलते अब 300 पर आ गया है। अगले दिन कंपनी तिमाही नतीज़े घोषित करती है जो उम्मीद से खराब होते हैं। शेयर और घटकर 200 रुपए पर आ जाता है। आपके सोचे भाव से पूरे 50% डिस्काउंट पर। क्या अब भी आप उसे खरीदेंगे? कतई नहीं। बल्कि अपने ग्रह-नक्षत्रों और भगवान का शुक्रिया अदा करेंगे कि आपने पहले इस शेयर को नहीं खरीदा।

इस तरह एक मोटामोटी समझ तो है हमारे अंदर असल और फाइनेंस उत्पादों के बीच अंतर करने की। लेकिन इस समझ को हम बराबर नहीं अपनाते। बीमा या म्यूचुअल फंड का डिस्ट्रीब्यूटर/एजेंट बताता है कि इसमें गारंटीड रिटर्न मिलेगा। आप जितना लगाएंगे, उसका दोगुना-तिगुना लाभ आपको मिलेगा। कोई दूसरा उस्ताद आता है कि बताता है कि आपके धन पर वो साल का कम से कम 50 फीसदी रिटर्न देगा। कोई दूसरा मल्टीबगैर बेचने के नाम पर आपसे साल भर के 35,000 रुपए झटक ले जाता है। कुछ तो महीने के 25,000 लेते हैं। आप इनके उत्पाद विश्वास में आकर उसी तरह खरीद लेते हैं जैसे दुकान में कोई फ्रिज़, वॉशिंग मशीन या टीवी खरीदते हैं।

टीवी, फ्रिज़ या वॉशिंग मशीन घर ले जाते ही आप चेक करके देख सकते हैं कि उनकी क्या परफॉर्मेंस है। कोई खराबी हुई तो वॉरंटी पीरियड में बदल लेंगे। लेकिन बीमा पॉलिसी, म्यूचुअल फंड या स्टॉक जैसे फाइनेंस उत्पाद अभी की नहीं, भविष्य की तारीख से बंधे होते हैं। उनकी परफॉर्मेंस दो-चार दिन में नहीं, दो-चार, दस-बीस साल में सामने आती है, जबकि दाम उसके आप पहले अभी ही दे देते हो। इसलिए असल और फाइनेंस उत्पादों की परख के पैमाने और उन्हें खरीदने की सोच अलग-अलग होनी चाहिए। लेकिन हमें तो सब धान बाइस पसेरी तौलने की सोच विरासत में मिली हुई है। बाप-दादा अभी या कभी किसानी से वास्ता रखते थे तो हम आज भी उन्हीं की सोच का कंटोप लगाकर टहलते रहते हैं।

अब ट्रेडिंग पर आया जाए तो मांग, सप्लाई और भाव का समीकरण फिर बदल जाता है। यहां मांग और सप्लाई की परिभाषा ही बदल जाती है। पहली बात कि हर किसी कंपनी के जारी शेयरों की संख्या सीमित होती है और उसमें भी प्रवर्तकों के हिस्से से बचा फ्लोटिंग स्टॉक बंधा होता है। आप कहेंगे कि इस तरह सप्लाई तो निश्चित है और कंपनी जब तक अपने शेयर बायबैक न करे या नए शेयर जारी न करे तब तक उसमें कोई घट-बढ़ कैसे हो सकती है? जहां तक मांग का सवाल है तो वह तो लोगों की जागरूकता पर निर्भर है कि वे शेयर बाज़ार या किसी खास कंपनी में कितना पैसा लगाते हैं।

लेकिन ट्रेडिंग के संदर्भ में यह सोच हकीकत से एकदम परे है। यहां डिमांड और सप्लाई वो तय करते हैं जो थोक में खरीदते या बेचते हैं। यानी, संस्थागत निवेशक। इसमें भी खास तौर पर बैंक, बीमा कंपनियां व एफआईआई। म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीमों में चूंकि आम रिटेल निवेशकों का जमावड़ा होता है। इसलिए इन निवेशकों के रिडेम्पशन के दबाव में म्यूचुअल फंड अमूमन जब खरीदना होता है, तब बेचते हैं और जब बेचना होता है, तब खरीदते हैं। आपने देखा होगा कि एफआईआई जब खरीदते हैं तो डीआईआई, जिनमें म्यूचुअल फंड प्रमुख हैं, बेचते हैं।

इसलिए हम संस्थागत निवेशकों की श्रेणी में बीमा कंपनियों, बैंकों व एफआईआई को ही गिन सकते हैं। इनका ट्रेजरी विभाग प्रोफेशनल ट्रेडरों से भरा होता है। जब ये संस्थाएं किसी स्टॉक, कमोडिटी या विदेशी मुद्रा को बेचने लगती हैं, तब सप्लाई बढ़ जाती है और भाव गिरने लगते हैं। वहीं जब ये संस्थाएं खरीदने लगती हैं तो डिमांड बढ़ जाती है और उनकी खरीद से शेयर चढ़ने लगते हैं। उनकी खरीद खत्म होते-होते हल्ला मच जाता है कि फलानां शेयर बढ़ रहा है। तब रिटेल निवेशक/ट्रेडर भी उसे लपकने लगते हैं। शेयर थोड़ा और चढ़ता है। लेकिन तभी संस्थाएं मुनाफावसूली करने लगती हैं। उनके बेचने से सप्लाई बढ़ जाती है और भाव गिर जाते हैं।

अगर हम शेयर बाज़ार से कमाना चाहते हैं तो हमें अपनी सोच में असल और फाइनेंस उत्पादों के बीच मांग, सप्लाई व भाव के भिन्न समीकरण को कायदे से समाहित करना होगा। फिर, अगर हम ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं कि हमें मन में बैठा लेना होगा कि हम न तो तेजी के पक्ष में हैं, न मंदी के पक्ष में, हम तो बस ट्रेडर हैं।

We are neither Bulls, nor Bears. We are just Traders!

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