निवेश में सफलता के लिए धैर्य से कहीं ज्यादा ज़रूरी है जिस कंपनी में आप निवेश कर रहे हैं, उसकी समझ। अक्सर हम ब्रोकर या किसी जान-पहचान वाले के कहने पर शेयर खरीद लेते हैं। इतना भर देखते हैं कि वो ज्यादा महंगा तो नहीं। आगे होता यह है कि हम साल-दर-साल इंतज़ार किए जाते हैं। लेकिन वो शेयर गिरते-गिरते रसातल तक पहुंच जाता है, बढ़ने का नाम ही नहीं लेता। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

अवसर लागत और आर्थिक मूल्य की धारणा आपस में जुड़ी हुई हैं। ऊपर से लगती हैं आसान, पर अंदर से हैं काफी उलझी हुई। लेकिन अवसरों को पकड़ने-छोड़ने के आज के दौर में इन्हें समझना ज़रूरी है। मसलन, नौकरी करते समय आप का वेतन 50,000 रुपए था। आपने बिजनेस शुरू किया तो महीने में 50,000 रुपए कमाते ही उसका आर्थिक मूल्य ऋणात्मक से शून्य हो जाता है जो सुखद स्थिति है। अब करते हैं शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

लागत के बिना कोई बिजनेस नहीं होता। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग भी बिजनेस है। कितने पर खरीदा व बेचा, इस पर दोनों तरफ कितना ब्रोकरेज़ दिया और कितना टैक्स देना होगा, यह सारा कुछ जोड़कर पूरी लागत निकलती है। यह भी आंकना पड़ता है जितना समय ट्रेडिंग में लगाया, उतने समय कोई और काम करते तो हम कितना कमाते। यहीं पर अवसर लागत व आर्थिक मूल्य की धारणा काम आती हैं। अब देखते हैं गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी की अद्यतन सूचना के मुताबिक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट में रजिस्टर्ड ब्रोकरों की संख्या 7306 और उनसे जुड़े सब-ब्रोकरों की संख्या 44,540 है। इस तरह करीब 52,000 लोग हैं जो चाहते हैं कि हम ज्यादा से ज्यादा ट्रेड करते रहें ताकि हर सौदे के ब्रोकरेज़ से उनका धंधा बढ़ता रहे। उनका स्वार्थ हमें लाभ कराने में नहीं, बल्कि अपने धंधे को बढ़ाने में है। अब आजमाते हैं बुध की बुद्धि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में कोई भी सौदा, चाहे वो बड़ी संस्था का हो या रिटेल निवेशक का, बिना ब्रोकर के नहीं होता। लेकिन ब्रोकर संस्थाओं के सौदों को ज्यादा ही तवज्जो देते हैं क्योंकि उनसे उन्हें बराबर व बड़ा धंधा मिलता है। इसीलिए वे अक्सर संस्थाओं का सौदा पूरा करने के लिए रिटेल निवेशकों का शिकार करते हैं। संस्थाओं की खरीद पर रिटेल निवेशक/ट्रेडर को बेचने और बिक्री पर खरीदने की सलाह देते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

आज शाम जून की रिटेल मुद्रास्फीति के आंकड़े आएंगे। इसका महत्व इसलिए है क्योंकि इसी के आधार पर रिजर्व बैंक ब्याज दर का फैसला करता है। ब्याज दर घटती है तो लोगबाग बैंक में जमा के बजाय अपना धन रियल एस्टेट या शेयर बाज़ार में लगाते हैं ताकि उन्हें ज्यादा रिटर्न मिल सके। इसीलिए ब्याज दर घटने पर अमूमन शेयर बाज़ार बढ़ता है। हालांकि चीन फिलहाल इस नियम का अपवाद है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कंपनी का शेयर 1.4 के पी/ई और 0.2 के पी/बी अनुपात पर ट्रेड हो रहा हो, उसका ऋण-इक्विटी अनुपात 0.7 हो और सालाना लाभांश यील्ड 17.7% हो तो किसी भी निवेशक का मन उसमें धन लगाने को ललचा जाएगा। पर, आईटी कंपनी हेलियोज़ एंड मैथेसन इतना होने के बावजूद न तो जमाकर्ताओं का धन और न कर्मचारियों का वेतन समय से दे पा रही है। इसलिए अंश नहीं, संपूर्ण को देखना ज़रूरी है। अब आज का तथास्तु…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में जो कुछ होता है, वो इंसान करते हैं, कोई भूत-भगवान या ग्रह-नक्षत्र नहीं। अल्गो ट्रेडिंग की प्रोग्रामिंग भी इंसान ही करते हैं। इन इंसानों की संख्या लाखों में हैं। बाज़ार के ग्लोबल हो जाने के बाद इनमें दक्ष लोग भी भरपूर हैं। अगर कोई इन सबकी भावनाएं भांप सके तो वो भावों का सटीक पूर्वानुमान लगा सकता है। लेकिन ऐसा संभव नहीं तो पिछले पैटर्न से काम निकालना पड़ता है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारे शेयर बाज़ार में देशी या विदेशी संस्थाओं के अलावा ब्रोकरेज हाउसों और पंटरों का भी खूब खेल चलता है। अक्सर ये लोग प्रवर्तकों से मिलकर तूफान मचाते हैं। लेकिन वे बड़ी कंपनियों में खास कुछ नहीं कर पाते। उनका दायरा मिड, स्मॉल या माइक्रो कैप कंपनियों तक सीमित रहता है। इसलिए अक्सर देखने में आता है कि धंधे में पिटी कंपनियों तक के शेयर उछल जाते हैं। हमें उनसे दूर रहना चाहिए। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार में ट्रेडिंग दरअसल एक जंग है जिसमें हम विरोधी का धन निकालकर अपने खाते में खींच लेते हैं। इसलिए यह भलीभांति समझना ज़रूरी है कि हमारे सामने कौन है। यह जानना भी ज़रूरी है कि बाज़ार में असली असर देशी-विदेशी संस्थाओं की हरकतों का पड़ता है। रिटेल ट्रेडर कभी भी बाज़ार की दशादिशा तय नहीं करते। लेकिन हम तो अक्सर अंधेरे में तीर चलाते हैं। लगा तो तीर नहीं तो तुक्का! अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी