हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम सभी के साथ समस्या है कि हम पछताते बहुत हैं। बार-बार ऐसा होता है कि कोई शेयर देखकर छोड़ देते हैं। अगले दिन जब वो 5% से ज्यादा उछल जाता है तो पछताते हैं कि काश! वो सौदा पकड़ लिया होता। असल में, यह सामान्य मानव मनोविज्ञान है। लेकिन यह सहजता-भरी सोच ट्रेडिंग के लिए घातक है। हम समय में पीछे नहीं जा सकते। इसलिए हमेशा आगे देखने का अभ्यास करना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बहुत सारे लोग मानते हैं कि शेयर बाज़ार सटोरियों का अड्डा है और यहां अधिकांश लोग जुआ खेलते हैं। यह मान्यता बहुत हद तक सही भी है। पिछले ही हफ्ते एक सब्सक्राइबर ने लिखा कि ऐसा जैकपॉट बताइए कि किस्मत चमक जाए। कैसे कहूं कि यह सोच एक तरह का डिप्रेशन दिखाती है। सच है कि बाज़ार में भविष्य का कयास लगाया जाता है, लेकिन यह सट्टेबाज़ी की तरह अंधा नहीं होता। अब निकालें मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार को समझने और पकड़ने के लिए कोशिश अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ के ज़माने से ही हो रही है। एक राय यह है कि भाव सभी पुरानी व नई उपलब्ध सूचनाओं के अलावा भावी संभावनाओं को भी जज्ब किए होते हैं। इसलिए अब तक के भावों का विश्लेषण कल के भावों का एकदम सटीक हाल बता देगा। वहीं, दूसरी राय इंसान की स्वभावगत कमज़ोरियों को भी तवज्जो देती है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अप्रैल 2011 में 115 पर खरीदने को सुझाया सुप्रीम इंडस्ट्रीज अप्रैल 2015 में 745 पर पहुंच गया। मई 2014 में 45 पर सुझाई गई कंपनी अभी 100 के आसपास है। चाहें तो हम दावा कर सकते हैं, हमारी निवेश सलाह सबसे अच्छी होती हैं। लेकिन सबसे अच्छा निवेश जैसी कोई चीज़ नहीं होती। रिस्क और रिटर्न का अभिन्न नाता ही निवेश की आत्मा है। 100 पर पहुंची कंपनी दे सकती है और 40% रिटर्न…और भीऔर भी

ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं तो गांठ बांध लें कि शेयरों के भाव या बाज़ार का कोई भी पूर्वानुमान 100% सही नहीं हो सकता। यहां प्रायिकता चलती है। सिक्का उछालने पर हेड/टेल आने की प्रायिकता 50% रहती है। वैसे ही बाज़ार में प्रायिकता चलती है। हम ज्यादा प्रायिकता वाले सौदे चुनते हैं और चूकने पर चोट न खाएं, इसके लिए स्टॉप लॉस या पोजिशन साइजिंग का सहारा लेते हैं। अब करते हैं नए संवत का पहला अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडर, निवेशक, विश्लेषक सभी जानना चाहते हैं कि बाज़ार आगे कहां जाएगा, कोई शेयर कहां पहुंचेगा। लेकिन इस बाज़ार की विचित्र हकीकत यह है कि यहां एक ही वक्त एक ही स्टॉक या सूचकांक को लेकर लोगों की राय एक-दूसरे से उलट होती है। ऐसा न हो तो बाज़ार ठप पड़ जाए, कोई ट्रेडिंग ही न हो। बाज़ार एकदम बर्फ की मानिंद जम जाए। धारणा विपरीत तो अनुमान कैसे हों एक! अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सारे एक्जिट पोल गलत निकले। बस, एक्सिस-एड प्रिंट मीडिया का एक्जिट पोल ही सही निकला जिसमें उसने बिहार में महागठबंधन को 169 से 183 और एनडीए को 58 से 70 सीटें मिलने की बात कही थी। वही हुआ। पर, टीवी18 समूह ने उसे दिखाया नहीं क्योंकि वो उनकी सोच से मेल नहीं खाता था। भविष्य की गणना में ऐसी भूलचूक का होना स्वाभाविक है। शेयर बाज़ार भी इसका अपवाद नहीं है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

बाज़ार का गिरना लंबे समय के निवेशकों के लिए अक्सर अच्छा होता है क्योंकि इस दौरान तमाम मजबूत कंपनियों के शेयर भी गिर जाते हैं। ऐसे मौके पर इन्हें पकड़ लेना मुनाफे का सौदा साबित होता है। आज हम तथास्तु में ऐसी कंपनी पेश कर रहे हैं, मजबूती के बावजूद जिसके शेयर गिरकर इधर अपने अंतर्निहित मूल्य के काफी करीब पहुंच गए हैं। इसमें अभी निवेश करना तीन साल में 35% से ज्यादा रिटर्न दे सकता है।औरऔर भी